छोटे-मंझोले कारोबारियों के सामने जीएसटी की दिक्कतें

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देहरादून (खबर संसार)
जीएसटी लागू हुए एक साल हो गया हैं। इसके फायदा-नुकसान पर तमाम बातें हो रही हैं। लेकिन छोटा, सूक्ष्म और मंझोला कारोबारी दिक्कत में है। उसकी दिक्कतें कम होने के बजाय बढ़ती ही गई हैं। उनके लिए कारोबार करना आसान नहीं बल्कि अधिक कठिन हो गया है। उनके ऊपर औपचारिकताओं और कागजी कामकाज का दबाब बहुत अधिक बढ़ गया है। इसका नकारात्मक असर व्यापार पर पड़ा है। उत्तराखंड में एक लाख के आसपास कारोबारी पंजीकृत हैं। इनमें से बहुत ही छोटे किस्म के कारोबारी अधिक हैं, लेकिन अगर उनके जरिए कम मात्रा में भी अधिक संख्या में टैक्स जाए तो राजस्व की मात्रा बहुत बढ़ जाएगी। हालांकि इसमें सरकारी मशीनरी के साथ ही कारोबारियों का सहयोग होना जरूरी होता है। इस समय जीएसटी के दो हिस्से हैं। एक स्टेट जीएसटी और दूसरा सीजीएसटी यानि केंद्रीय जीएसटी। व्यापारी नेता विवेक अग्रवाल, पंकज गुप्ता कहते हैं कि हमारे प्रदेश में जीएसटी लागू करने की सुविचारित नीति का बहुत भारी अभाव है। उत्तराखंड का अधिकतर कारोबारी छोटे व मंझोले स्तर का ही है। उसकी दिक्कतों को दूर किए बगैर भले ही राजस्व बढ़ जाए, लेकिन उससे बहुत दूरगामी लाभ मिलने वाले नहीं हैं। तमाम पहलुओं पर चिंतन ही नहीं हुआ है। यही वजह है कि दरों में बार-बार बदलाव करने पड़े हैं। इसके साथ ही सेस को भी जोड़ा जा रहा है। वाणिज्य कर के पूर्व संयुक्त आयुक्त एसपी नौटियाल कहते हैं कि वस्तु एवं सेवा कर बहुत ही शानदार विचार है। इसका लक्ष्य रहा है साझा बाजार की स्थापना करना। कर का अधिक संग्रह और राजस्व में इजाफे के साथ ही एक कर प्रणाली की स्थापना करना रहा है। इससे कारोबारियों के साथ ही आम उपभोक्ता को भी बहुत लाभ मिलने की संभावना है, लेकिन फिलहाल इस समय काफी बाधाएं खड़ी हो गई हैं। उनको दूर करना बहुत आवश्यक है। इनसे निपटे बगैर हम जीएसटी को सफल नहीं बना पाएंगे। इसके लिए क्रियान्वयन पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। एक साल में जो मोटी-मोटी कमियां हैं, उन पर बहुत ध्यान देना होगा। जीएसटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अभी समानांतर अर्थव्यवस्था जारी है। इसको कुंद करने के लिए बहुत काम करना पड़ेगा।

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