महान साहित्यकार रबिंद्रनाथ टैगोर से जुड़ी कुछ अनोखी बातें

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नई दिल्ली (खबर संसार)
आज महान साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर की आज पुण्यतिथि है। साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर को महात्मा गांधी ने सबसे पहले गुरुदेव कहा था। टैगोर का जन्म 7 मई 1861 में कलकत्ता में हुआ था और 7 अगस्त 1941 में रबिंद्रनाथ टैगोर का कलकत्ता में ही निधन हो गया था। कहा जाता है कि उन्होंने महज आठ साल की उम्र से कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। इनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उन्होंने सात फेरे लिए। गीतांजली के लिए साहित्य का नोबेल जीतने वाले रवींद्र को सब राष्ट्रगान के रचयिता के रुप में जानते है। इतना ही नहीं टैगोर ने कला, साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन में कई तरह से हिस्सदारी की थी।
बचपन में ही उठ गया था मां का साया।
टैगोर की माता का निधन उनके बचपन में हो गया था और उनके पिता व्यापक रूप से यात्रा करने वाले व्यक्ति थे। जब टैगौर की उम्र 11 वर्ष की थी जब उनके पिता कई महीनों के लिए भारत का दौरा करने के लिए निकल गए थे उनके साथ ही टैगोर भी फरवरी 1873 में कलकत्ता छोड़कर अपने पिता के शांतिनिकेतन सम्पत्ति और अमृतसर सेडेलाहौसी के हिमालयी पर्वतीय स्थल तक निकल गए थे। वहां टैगौर ने जीवनी इतिहास, खगोल विज्ञान आधुनिक विज्ञान और संस्कृत का अध्ययन किया था साथ ही कालीदास और की शास्त्रीय कविताओं के बारे में भी पढ़ाई की थी। साल 1873 में अमृतसर में अपने एक महीने के प्रवास के दौरान वह सुप्रभात गरनबानी और नानक बनी से बहुत प्रभावित हुए थे जिन्हें स्वर्ण मंदिर में गाया जाता था। उन्होंने इसके बारे में अपनी पुस्तक मेरी यादों में उल्लेख कम जो 1912 में प्रकाशित हुई थी।
पहले भारत रत्न हासिल करने वाले भारतीय जिन्होंने किया था साबुन कोल्ड्रिंक के लिए विज्ञापन
ेटैगोर पहले ऐसे भारत रत्न है जिन्होंने 500 से ज्यादा विज्ञापन किए थे। उस वक्त प्रिंट विज्ञापनों में टेगौर की बाते लिखी रहती थी। गोर्दरेज साबुन और रेडियम स्नो क्रीम की अच्छी क्वालिटी और विदेशी प्रोडक्ट्स से इनके बेहतर होने जैसी बातें कोट होती थीं।
अंत में टैगौर द्वारा लिखी हुई कुछ रचनाएं इस तरह है। चल तू अकेला, तेरा आह्वान सुन कोई ना आए तो चल तू अकेला, जब सबके मुंह पे पाश, ओरे-ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश, हर कोई मुंह मोड़के बैठे हर कोई डर जाय, तब भी तू दिल खोलके अरे! जोश में आकर, मनका गाना गूंज तू अकेला, जब हर कोई वापस जाय, कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय।

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