अयोध्या विवाद का हल ढूंढने के लिए कई सालों से प्रयास जारी!

नई दिल्ली (खबर संसार) अयोध्या विवाद का मध्यस्थता से हल निकालने की कोशिश तो 1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई थी उससे पहले भी हो चुकी है। सन 1990 में जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए गंभीर पहल की थी। उन्होंने मध्यस्ता के जरिए इसका समाधान निकालने के लिए एक कमिटी का गठन किया था।
इस कमेटी में शरद पवार और राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत शामिल थे। हालांकि चंद्रशेखर सरकार ज्यादा दिन टिक नहीं पाई, उनकी सरकार गिर गई जिस वजह से ये कोशिश नाकामियाब हो गई।

नरसिम्हा राव के कार्यकाल में भी हुई थी कोशिश

चंद्रशेखर के बाद केंद्र में पी.वी नरसिम्हा राव की सरकार बनी। उनके कार्यकाल में भी कोशिश की गई की बातचीत के दरिए इस मुद्दे को सुलझाया जा सके। इसकी जिम्मेदारी राव ने कांची, द्वारका और पुरी के शंकराचार्यों को दी लेकिन कोई हल नहीं निकला।

हाई कोर्ट ने भी दिया विकल्प

अगस्त 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों से पूछा कि क्या वे मध्यस्थता के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करेंगे। लेकिन वकीलों ने मध्यस्थता की किसी भी कोशिश से साफ इनकार कर दिया।

2017 में भी की गई कोशिश

2017 मार्च में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश जे.एस खेहर ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को बातचीत के जरिए हल निकालने का सुझाव दिया था। उन्होंने सभी पक्षों से कहा था कि वो आपस में बातचीत करके और थोड़ा लचीला रूख अपनाकर इस विवाद को खत्म करें।
सीजेआई खेहर ने अयोध्या विवाद को भावनाओं और धर्म से जुड़ा मामला बताते हुए कहा इसे मध्यस्थता के जरिए ही हल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जब ये बात कही तब आध्यात्मिक गुरु श्री-श्री रविशंकर ने व्यक्तिगत स्तर पर विवाद को सुलझाने की कोशिश की। उन्होंने अयोध्या का दौरा भी किया और संबंधित पक्षकारों से मुलाकात की। हालांकि ये कोशिश भी नाकाम रही। इस बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने बनाई मध्यस्थता के लिए कमिटी का गठन किया है। मध्यस्थता न्यायालय ने शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफ एम आई कलीफुल्ला को मध्यस्थता के लिये गठित तीन सदस्यीय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है। अन्य सदस्यों में आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल हैं।

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