सदभाव से हांफता वन निगम

हल्द्वानी (राजेश सरकार )। मशहूर कहावत है की ”अमीर करे तो डांस, गरीब करे तो मुजरा”।  इन्ही चन्द  पंक्तियॉं के  इर्द गिर्द घूमती दिखाई दे रही है उत्तराखंड वन निगम के अधिकारियों की कार्यप्रणाली।

निगम के ये बड़े अधिकारी नियम तोड़ने पर छोटे कारोबारियों पर तो बड़ी कार्रवाई करते दिखाई देते है लेकिन बड़े कारोबारियों पर ऐसा  करते वक्त इन्हें साँप सूंघ जाता है। विभाग का ऐसा ही एक कारनामा खासा चर्चा में है।

बता दे की कुछ दिन पूर्व दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला ने प्रमुखता से ये खबर प्रकाशित की थी कि “एनएच की कम्पनी के लिए सब गुनाह माफ़”। इस खबर के माध्यम से सुधी पाठको को समाचार पत्र ने यह बताने का प्रयास किया  गया था कि गौला नदी पर बने पुल को एनएच 87 का निर्माण करने वाली “सदभाव कम्पनी” किस तरह नुक्सान पहुचाने का कार्य कर रही है।

फोटो भी किया गया था प्रकाशित

उपखनिज ढोने वाले इस कम्पनी के वाहनो में पुल के पिलरों के आस पास से उपखनिज खोदकर ढोया जा रहा था। जिसका बकायदा फोटो भी प्रकाशित किया गया । उक्त समाचार छपा और विभाग के अधिकारी हरकत में आये और आनन फानन में एक जाँच कमेटी बनाई गई जिसने जाँच के बाद पुरे मामले को सही भी पाया और फिर शुरू हुई  पुल को नुकसान पहुचाने की आरोपी सदभाव कम्पनी  पर बड़ी कार्यवाई करने की कवायद।

काफी माथापच्चीसी के बाद विभाग के बड़े अधिकारियो ने इस अपराध को कमत्तर आंका और  मात्र 68 हजार रूपये का जुर्माना सदभाव कम्पनी पर डाल कर मामले की फाइल बन्द करने में ही अपना व विभाग का भला समझा। अब  यहाँ सवाल यह उठता है कि शहर के किसी आम नागरिक का यदि उपखनिज  ढुलान करने वाला वाहन या घोड़ा बुग्गी  वन निगम का कोई कानून गलती से भी तोड़ता है तो उसके खिलाफ वन महकमा बड़ी करवाई करते हुए उक्त वाहन को 15 दिन तक अपने कब्जे में लेने के साथ ही 50 हजार से लेकर एक लाख रूपये तक का जुर्माना वसूलता है।

लेकिन नियम तोड़ने व गौला नदी पर करोडो रूपये की लागत से बने पुल को नुकसान पहुचाने की आरोपी सदभाव कम्पनी के बड़े वाहनो ( हाइवा) की न तो नदी से निकासी बन्द की जाती है और न ही इनसे प्रति गाड़ी  जुर्माना   वसूला जाता है। मामले में खानापूर्ति करते हुए विभाग ने कम्पनी पर मात्र 68 हजार ही जुर्माना डाला है। यह कार्यवाई निगम  अधिकारियो के दोहरे चरित्र को तो दर्शा ही  रही है साथ ही खासी चर्चा में भी है।

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