नई दिल्ली। “जितनी बड़ी मछली उतना गहरा जाल” यह कहावत अमेरिका पर पूरी तरह लागू होती है। वैश्विक राजनीति में अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए अमेरिका कई बार देशों पर दबाव डालता है। लेकिन भारत ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि उसकी आर्थिक नीतियों पर किसी बाहरी शक्ति का नियंत्रण नहीं होगा।
हाल ही में अमेरिकी व्हाइट हाउस के पूर्व सलाहकार पीटर नवारो ने फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख लिखकर भारत को निशाना बनाया। उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग अमेरिका की मंजूरी से करना चाहिए और रूस से तेल खरीदने में डॉलर खर्च नहीं करना चाहिए। नवारो ने दावा किया कि भारत के पास अमेरिका के साथ 40 मिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस है, जिसका इस्तेमाल रूसी तेल खरीद में हो रहा है।
पुराना दबाव, नई प्रतिक्रिया
यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका ने इस तरह की शर्तें थोपने की कोशिश की हो। 1960-70 के दशक में भी अमेरिका ने जर्मनी पर इसी तरह का दबाव बनाया था कि वह अपने डॉलर रिजर्व का इस्तेमाल सिर्फ अमेरिकी व्यापार के लिए करे। अब वही रणनीति भारत के खिलाफ अपनाई जा रही है।
अमेरिकी मंत्री का बयान और विवाद
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा कि भारत की रूसी तेल पर निर्भरता चीन की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस बयान को भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि 2024 में रूस से चीन का तेल आयात 62.59 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था और जुलाई 2025 में चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा आयातक बना।
सिब्बल ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि अमेरिका जानबूझकर भारत के साथ तनाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि असली आंकड़े चीन पर ज्यादा निर्भरता दिखाते हैं। उन्होंने गज़प्रोम की ‘पावर ऑफ साइबेरिया’ पाइपलाइन का उदाहरण देते हुए कहा कि यह चीन को गैस आपूर्ति का बड़ा स्रोत है, जो रूस की ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है।
भारत का सख्त संदेश
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी आर्थिक नीतियों को लेकर किसी बाहरी दबाव में नहीं आएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा दे सकता है।
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