खाड़ी देशों में तनाव कम होने की खबरों के बीच अब एक नई चुनौती सामने आ गई है। युद्धविराम के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिर तेज हुई है, लेकिन समुद्र में तेल ढोने वाले बड़े जहाजों की भारी कमी देखने को मिल रही है। इसका असर सीधे भारत के तेल आयात पर पड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि भारत आने वाले एक बड़े कच्चा तेल टैंकर का किराया सामान्य दर से करीब 9 गुना अधिक तय किया गया है, जिसे इस साल की सबसे महंगी शिपिंग डील माना जा रहा है।
दक्षिण कोरिया की शिपिंग कंपनी सिनोकोर द्वारा की गई इस बुकिंग ने यह साफ संकेत दिया है कि होर्मुज क्षेत्र का संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि अब यह सप्लाई और शिपिंग संकट के रूप में उभर रहा है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा तेल टैंकर का किराया
फारस की खाड़ी से भारत तक कच्चा तेल पहुंचाने के लिए जिस विशाल टैंकर को बुक किया गया है, उसमें लगभग 20 लाख बैरल तेल ले जाने की क्षमता है। शिपिंग बाजार से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार इस जहाज का किराया सामान्य दरों की तुलना में करीब 9 गुना ज्यादा तय हुआ है। यह रिकॉर्ड स्तर की बुकिंग बताती है कि क्षेत्र में तनाव भले कम दिखाई दे रहा हो, लेकिन समुद्री व्यापार अब भी पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं लौटा है।
कैसे तय होता है तेल जहाजों का किराया?
तेल टैंकरों का किराया सीधे तय रकम के आधार पर नहीं होता। इसके लिए एक विशेष अंतरराष्ट्रीय शिपिंग सिस्टम अपनाया जाता है, जिसमें हर समुद्री रूट के लिए एक मानक किराया निर्धारित रहता है। इसके बाद वास्तविक किराया उसी आधार दर के प्रतिशत के रूप में तय किया जाता है।
सरल शब्दों में समझें तो इस बार तेल आयात करने वाली कंपनियों को एक खेप मंगाने के लिए सामान्य लागत से लगभग 9 गुना ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है।
मार्च 2026 से शुरू हुआ था बड़ा संकट
दरअसल, मौजूदा स्थिति की शुरुआत मार्च 2026 में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव से हुई थी। इस टकराव के बाद होर्मुज क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही करीब 92 फीसदी तक प्रभावित हो गई थी।
यह वही रणनीतिक समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया की लगभग 20 फीसदी तेल सप्लाई गुजरती है। उस दौरान तेल टैंकरों का दैनिक किराया बढ़कर 4 लाख 23 हजार 736 डॉलर तक पहुंच गया था। हालात इतने खराब हो गए थे कि कई बीमा कंपनियों ने जहाजों को सुरक्षा कवर देना भी बंद कर दिया था।
रास्ता खुला, लेकिन जहाजों की कमी बनी बड़ी समस्या
जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद हालात कुछ सामान्य हुए और तेल कंपनियों ने दोबारा खाड़ी देशों से तेल आयात बढ़ाना शुरू किया। हालांकि, अब सबसे बड़ी समस्या जहाजों की उपलब्धता बन गई है।
तनाव के दौरान कई शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाज दूसरे रूट्स पर भेज दिए थे। अब उनकी वापसी में समय लग रहा है। मौजूदा स्थिति में ओमान की खाड़ी में एक सप्ताह के भीतर केवल 65 खाली टैंकर उपलब्ध हो सकते हैं, जिनमें से 25 जहाज अकेले सिनोकोर कंपनी के पास हैं। मांग लगातार बढ़ रही है और जहाज सीमित हैं, इसलिए कंपनियां मजबूरी में ऊंची कीमत चुकाने को तैयार हैं।
भारत सरकार ऊर्जा सुरक्षा पर अलर्ट
इस पूरे संकट को देखते हुए भारत सरकार ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है। सरकार लगातार अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और सहयोगी देशों के साथ संपर्क में बनी हुई है।
राहत की बात यह है कि 94 भारतीय नाविकों और करीब 8.6 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल से लदे तीन भारतीय जहाज — देश वैभव, देश विभोर और सन्मार हेराल्ड — ने सुरक्षित रूप से इस संवेदनशील समुद्री मार्ग को पार कर लिया है। ये जहाज 24 जून से 1 जुलाई 2026 के बीच भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच रहे हैं।
विदेश मंत्रालय के अनुसार अमेरिका-ईरान समझौते के बाद अब तक भारत आने वाले कुल 11 जहाज इस रूट से सुरक्षित गुजर चुके हैं।
रूस से रिकॉर्ड स्तर पर तेल खरीद रहा भारत
भारत ने पहले ही संभावित संकट को देखते हुए अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव शुरू कर दिया था। भारत की एलपीजी जरूरतों का लगभग 90 फीसदी हिस्सा इसी खाड़ी क्षेत्र से आता है, इसलिए किसी भी बाधा का सीधा असर देश की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
इसी वजह से भारत ने रूस से तेल आयात में नया रिकॉर्ड बनाया है। जून 2026 में रूस से आने वाला कच्चा तेल 26 लाख बैरल प्रतिदिन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। अब भारत के कुल तेल आयात का लगभग 53.5 फीसदी हिस्सा अकेले रूस से आ रहा है। इसके अलावा भारत ने उत्तरी अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से भी तेल खरीद बढ़ाई है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
इस संकट का असर आम जनता पर भी पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में फिलहाल गिरावट देखने को मिल रही है। ब्रेंट क्रूड का भाव घटकर करीब 73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
इसके बावजूद जहाजों की कमी बनी रहने तक भारत की सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव बना रहेगा। संकट के दौरान ये कंपनियां प्रतिदिन करीब 650 करोड़ रुपये तक का नुकसान झेल रही थीं।
अगर आने वाले हफ्तों में टैंकरों की उपलब्धता सामान्य हो जाती है तो भारत का आयात बिल घट सकता है। इससे रुपये को मजबूती मिलेगी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी राहत मिलने की संभावना बनेगी। फिलहाल हालांकि शिपिंग संकट ने सरकार और तेल कंपनियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
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