मध्य पूर्व में जारी इजराइल और ईरान के बीच तनाव अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक खुद को इजराइल द्वारा तेहरान के परमाणु केंद्रों पर हुए हमलों से दूर रखा था, लेकिन अब उन्होंने सीधे हस्तक्षेप करते हुए अमेरिका को इस संघर्ष में शामिल कर दिया है। ट्रंप के इस कदम के गंभीर अंतरराष्ट्रीय प्रभाव हैं — न सिर्फ अमेरिकी राजनीति और विदेश नीति के लिए, बल्कि पूरी एशियाई भू-राजनीति के लिए भी।
ईरान पर अमेरिकी बमबारी: परमाणु ठिकानों को बनाया निशाना
अमेरिका ने रविवार तड़के ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों पर बंकर बम गिराए। यह हमला इजराइल के पिछले कदमों को मजबूती देने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के मकसद से किया गया। राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस से राष्ट्र को संबोधित करते हुए दावा किया कि ईरान के परमाणु ठिकानों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है।
ईरान ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने चेतावनी देते हुए कहा कि अब कूटनीति का दौर समाप्त हो गया है और ईरान आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करेगा।
ईरान को अमेरिका की सख्त चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में अमेरिका की कार्यवाहक राजदूत डोर्थी शी ने दो टूक कहा कि यदि ईरान ने अमेरिकी नागरिकों या सैन्य अड्डों पर किसी भी प्रकार का हमला किया, तो अमेरिका कड़ा जवाब देगा। उन्होंने कहा कि यह कदम इजराइल और अमेरिका दोनों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
शांति की उम्मीद या नए युद्ध की दस्तक?
डोर्थी शी ने सुरक्षा परिषद से अपील की कि वह ईरान से दशकों पुरानी इजराइल-विरोधी रणनीति को समाप्त करने और शांति वार्ता के लिए आगे आने का आग्रह करे। अमेरिका ने ईरान को स्पष्ट संदेश दिया है: अब केवल कूटनीति ही नहीं, सैन्य ताकत भी अमेरिका की नीति का हिस्सा है।
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