सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े एक अहम मामले में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) के नए इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने इन नियमों को पहली नजर में अस्पष्ट और विवादास्पद बताते हुए केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
कोर्ट की टिप्पणी: भाषा में खामी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत नियमों की संवैधानिकता और वैधता की जांच कर रही है। कोर्ट ने कहा कि वह शैक्षणिक संस्थानों में स्वतंत्र, न्यायसंगत और समावेशी वातावरण चाहती है और नियमों की भाषा में संशोधन की जरूरत है।
विवाद की जड़: जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा
23 जनवरी 2026 को अधिसूचित UGC नियमों के रेगुलेशन 3(C) को याचिकाओं में चुनौती दी गई। इन नियमों में जाति-आधारित भेदभाव को केवल SC, ST और OBC समुदायों तक सीमित कर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे जनरल कैटेगरी के छात्र शिकायत निवारण तंत्र से बाहर हो जाते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
छात्रों का विरोध और सियासी हलचल
नियमों के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में छात्रों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये नियम समानता बढ़ाने के बजाय कैंपस में नया भेदभाव पैदा करते हैं। इस बीच, रायबरेली से भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने UGC नीतियों से असहमति जताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
2012 बनाम 2026: क्या है बड़ा फर्क?
UGC के 2012 नियम जाति-आधारित भेदभाव को व्यापक रूप से परिभाषित करते हैं और सभी श्रेणियों के छात्रों को सुरक्षा देते हैं। वहीं 2026 नियम केवल आरक्षित वर्गों तक सीमित थे। सुप्रीम कोर्ट की चिंता यही है कि किसी भी छात्र को उसकी जाति के आधार पर सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिलहाल UGC नियम 2012 ही लागू रहेंगे। जब तक नए नियमों को अधिक समावेशी नहीं बनाया जाता, तब तक 2026 के नियम प्रभावी नहीं होंगे।
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