देश में नकदी की बढ़ती जरूरत को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर प्लास्टिक आधारित मुद्रा नोटों को प्रचलन में लाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। जानकारी के मुताबिक केंद्रीय बैंक ने हाल ही में पटना और मुंबई में आयोजित दो महत्वपूर्ण बैठकों में इस विषय पर विस्तार से विचार-विमर्श किया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में प्लास्टिक नोटों को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है।
क्यों बढ़ रही है प्लास्टिक नोटों की जरूरत?
आरबीआई प्लास्टिक नोटों के विकल्प पर इसलिए विचार कर रहा है क्योंकि इनकी उम्र पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा लंबे समय में इनकी छपाई और रखरखाव की लागत भी कम पड़ सकती है। सूत्रों के अनुसार बैंकिंग तकनीक में हुए सुधार के कारण अब एटीएम और नकदी प्रबंधन से जुड़ी मशीनें प्लास्टिक नोटों की पहचान और वितरण करने में सक्षम हो चुकी हैं। यही वजह है कि इस परियोजना को फिर से आगे बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची देश में नकदी की मांग
डिजिटल भुगतान के विस्तार के बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 15 मई तक बाजार में उपलब्ध कुल नकदी का मूल्य बढ़कर 42.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारों और दैनिक लेनदेन में नकदी की अहम भूमिका अभी भी बनी हुई है, जिसके कारण मुद्रा की मांग में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।
नोट छपाई पर बढ़ा खर्च
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान मुद्रा नोटों की छपाई पर 6372.8 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इससे पहले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 5101.4 करोड़ रुपये था। खर्च में इस वृद्धि की मुख्य वजह बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक संख्या में नोटों की छपाई बताई जा रही है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाले प्लास्टिक नोट आरबीआई के लिए एक व्यवहारिक समाधान साबित हो सकते हैं।
खराब नोटों के निपटान की चुनौती
भारतीय रिजर्व बैंक के सामने एक बड़ी समस्या पुराने और खराब हो चुके नोटों के निस्तारण की भी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में लगभग 23.8 अरब नोट नष्ट किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.3 प्रतिशत अधिक हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या 500 रुपये के नोटों की रही, जबकि उसके बाद 100 रुपये के नोट शामिल रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक नोटों के इस्तेमाल से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की मांग बनी हुई
देश में 10 रुपये और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की मांग लगातार बनी हुई है। हालांकि कुल मुद्रा मूल्य में इनकी हिस्सेदारी सीमित है, लेकिन रोजमर्रा के लेनदेन में इनका उपयोग काफी अधिक होता है। यही कारण है कि लंबे समय तक टिकने वाले नोटों की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जिससे बार-बार छपाई की जरूरत कम हो सके।
सिक्कों को बढ़ावा देने की कोशिश रही सीमित
आरबीआई ने पहले छोटे लेनदेन के लिए सिक्कों के उपयोग को बढ़ावा देने का प्रयास किया था। हालांकि लोगों के बीच सिक्कों को अपेक्षित स्तर की स्वीकार्यता नहीं मिल सकी। वर्ष 2024-25 में करीब 1.5 अरब सिक्कों की आपूर्ति की गई थी, जिनमें 5 रुपये के सिक्कों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही।
2012 में भी शुरू हुई थी योजना
यह पहला मौका नहीं है जब प्लास्टिक नोटों पर चर्चा हो रही है। वर्ष 2012 में भी पांच शहरों में परीक्षण के तौर पर प्लास्टिक नोट जारी करने की योजना बनाई गई थी। उस समय लगभग एक अरब 10 रुपये के प्लास्टिक नोट जारी करने की तैयारी थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों और मशीनों की अनुकूलता की समस्याओं के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
अब तकनीक बनी बड़ी ताकत
सूत्रों के मुताबिक वर्तमान समय में बैंकिंग और नकदी वितरण प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक हो चुकी है। नई तकनीक के जरिए एटीएम और अन्य बैंकिंग मशीनों को प्लास्टिक नोटों के अनुरूप तैयार किया जा चुका है। इसी वजह से आरबीआई इस परियोजना को दोबारा शुरू करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
दुनिया के कई देशों में सफल है प्लास्टिक मुद्रा
दुनिया के लगभग 60 देशों में प्लास्टिक आधारित मुद्रा नोटों का उपयोग किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट जारी किए थे। इसके बाद सिंगापुर, कनाडा, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और रोमानिया सहित कई देशों ने इस तकनीक को अपनाया और सकारात्मक परिणाम हासिल किए।
क्या होंगे संभावित फायदे?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि भारत में प्लास्टिक नोट सफलतापूर्वक लागू होते हैं तो इससे कई लाभ मिल सकते हैं। नोटों की आयु बढ़ेगी, छपाई पर होने वाला खर्च कम होगा और नकदी प्रबंधन प्रणाली अधिक प्रभावी बन सकेगी। साथ ही पुराने और क्षतिग्रस्त नोटों की संख्या में भी कमी आएगी, जिससे बैंकिंग व्यवस्था पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ घट सकता है।
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