वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान संवैधानिक सीमाओं का अहम सवाल उठा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र की इस दलील से सहमति जताई कि नए आपराधिक प्रावधान पर अंतिम फैसला संसद को करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया संविधान का अहम सवाल
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि जब मौजूदा कानून किसी कृत्य को अपराध के रूप में परिभाषित नहीं करता, तो उसके लिए आपराधिक दंड कैसे दिया जा सकता है।
BNS में भी मौजूद है वैवाहिक अपवाद
भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में Exception 2 के तहत पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले के बाद पत्नी की उम्र को लेकर यह सीमा 18 वर्ष से संबंधित हो गई। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63(2) में भी इसी प्रकार का अपवाद मौजूद है।
केंद्र बोला- कानून में बदलाव संसद के जरिए हो
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामला सामाजिक, कानूनी और संवैधानिक रूप से अत्यंत जटिल है और इसका समाधान संसद के स्तर पर होना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि सरकार को मौजूदा कानून में समस्या लगती है, तो संसद की मंजूरी के साथ कानून को दोबारा तैयार किया जाना चाहिए।
महिला की पीड़ा स्वीकार, लेकिन कानूनी आधार पर सवाल
पीठ ने कहा कि पति द्वारा इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध के लिए मजबूर की गई महिला “निश्चित रूप से पीड़िता” है। हालांकि सवाल यह है कि मौजूदा वैवाहिक अपवाद के रहते पति पर बलात्कार का मुकदमा चलाने का कानूनी आधार क्या होगा। कर्नाटक के मामले में हाई कोर्ट ने अभियोजन की अनुमति दी थी। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले को पहले सुनने पर विचार कर रहा है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह महिला की शारीरिक स्वायत्तता और सहमति के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। वहीं केंद्र सरकार ने सामाजिक ढांचे, संभावित दुरुपयोग और सबूत जुटाने की कठिनाइयों का हवाला दिया है। मामले की अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध की गई है।
वैवाहिक बलात्कार के 10 अहम बिंदु
- वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग पर सुनवाई जारी है।
- सुप्रीम कोर्ट के सामने संवैधानिक सीमा का सवाल उठा।
- पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं।
- पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं।
- अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख किया।
- BNS की धारा 63(2) में वैवाहिक अपवाद मौजूद है।
- केंद्र ने अंतिम फैसला संसद पर छोड़ने की बात कही।
- याचिकाकर्ताओं ने महिला की शारीरिक स्वायत्तता का तर्क दिया।
- कर्नाटक का मामला इस बहस में अहम बना हुआ है।
- सुप्रीम कोर्ट ने मामले को तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
यह भी पढ़ें- Anushka ने प्यूमा पर लगाया बिना परमिशन फोटो इस्तेमाल करने का आरोप






