खुद की मेहनत से अर्जित संपत्ति पर महिला का पूरा अधिकार होता है, लेकिन कई बार शादी के बाद महिलाएं यह मान लेती हैं कि वसीयत बनाना उनकी जिम्मेदारी नहीं है। अक्सर यह सोच गंभीर विवादों का कारण बनती है, खासकर तब जब महिला की मृत्यु बिना वसीयत के हो जाती है। ऐसे मामलों में मायके और ससुराल पक्ष के बीच संपत्ति विवाद आम है, जो कई बार अदालत तक पहुंच जाता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादीशुदा महिलाएं पूरी तरह से वसीयत बना सकती हैं, चाहे संपत्ति उन्होंने खुद कमाई से खरीदी हो या विरासत में मिली हो। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई हिंदू महिला बिना पति, बेटे या बेटी के मरती है, तो वसीयत बनाना ही उनके लिए सबसे बेहतर विकल्प है, जिससे भविष्य में विवादों से बचा जा सके।
विवाद की स्थिति में क्या होगा? कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि महिला की मृत्यु के बाद यदि माता-पिता और ससुराल पक्ष के बीच संपत्ति को लेकर विवाद हो, तो पहले प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता आवश्यक होगी। अदालत का मानना है कि इससे अनावश्यक लंबी कानूनी लड़ाई को रोका जा सकता है और आपसी समाधान का रास्ता खुल सकता है।
बिना वसीयत के शोहरत में कौन बनता है वारिस?
जब कोई महिला बिना वसीयत के मरती है, तो संपत्ति का वितरण हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के तहत होता है। यह नियम बताता है कि:
- पहला हक पति, बच्चे या बच्चों के बच्चों को मिलता है।
- यदि ये मौजूद नहीं हों, तो संपत्ति पति के परिवार में जाती है।
- मायके वालों का अधिकार तभी आता है जब पति के परिवार में कोई वारिस न हो।
कई मामलों में पति की बहन, मां या अन्य रिश्तेदार महिला की संपत्ति पर दावा करते हैं, जबकि महिला के माता-पिता इसे अपना अधिकार बताते हैं। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञ महिलाओं को सलाह देते हैं कि वे अपनी जीवनकाल में ही वसीयत बनवा लें, ताकि उनकी संपत्ति सही व्यक्ति तक पहुंचे। वसीयत बनाना केवल अधिकार नहीं, बल्कि भविष्य के विवादों से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका है। शादीशुदा महिलाएं अपनी संपत्ति को किसे देना चाहती हैं, यह पूरी तरह उनका निर्णय है—और वसीयत इसे कानूनी रूप से मजबूत बनाती है।
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