NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ चले CJP आंदोलन की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि अब देश में E20 फ्यूल को लेकर विरोध की नई लहर तेज होती दिखाई दे रही है। सोशल मीडिया, सड़कों और संसद तक यह मुद्दा तेजी से फैल रहा है, जिससे सरकार की E20 नीति पर सवाल उठने लगे हैं।
CJP के बाद E20 फ्यूल बना नया विवाद
CJP आंदोलन के समापन के महज दो दिन बाद E20 फ्यूल के विरोध ने रफ्तार पकड़ ली। इस दौरान नया नारा सुनाई देने लगा— “धर्मेंद्र प्रधान गए, अबकी बार गडकरी बाहर!”। इंस्टाग्राम से लेकर टाउन हॉल और संसद तक यह मुद्दा लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह विरोध भी CJP की तरह बड़े जन आंदोलन का रूप ले पाएगा।
E20 फ्यूल क्या है और विवाद क्यों बढ़ रहा है?
E20 ऐसा पेट्रोल है जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल (गन्ने और मक्का जैसी फसलों से तैयार बायोफ्यूल) तथा 80 प्रतिशत पारंपरिक पेट्रोल मिलाया जाता है। केंद्र सरकार ने तेल आयात कम करने, प्रदूषण घटाने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से अप्रैल 2025 से इसे देशभर के पेट्रोल पंपों पर मानक ईंधन (स्टैंडर्ड फ्यूल) के रूप में लागू किया। हालांकि, विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि भारत में 75 प्रतिशत से अधिक वाहन तकनीकी रूप से E20 के अनुरूप डिजाइन नहीं किए गए हैं।
वाहन मालिकों की क्या हैं प्रमुख शिकायतें?
पुरानी गाड़ियों के मालिकों का दावा है कि E20 फ्यूल इस्तेमाल करने से माइलेज में 4 से 12 प्रतिशत तक कमी आ रही है और इंजन के कुछ पुर्जों पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। वहीं सरकारी आंकड़ों में भी 3 से 3.5 प्रतिशत तक माइलेज घटने की बात स्वीकार की गई है।
अदालत के फैसले से बढ़ा विवाद
E20 विवाद को उस समय और बल मिला जब 18 मई 2026 को अदालत ने इंजन खराब होने से जुड़े एक मामले में कार मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया। विरोध करने वालों का कहना है कि उपभोक्ताओं को E20 और शुद्ध पेट्रोल के बीच विकल्प नहीं दिया जा रहा है। उनका आरोप है कि उपलब्ध शुद्ध पेट्रोल की कीमत E20 की तुलना में 40 से 50 प्रतिशत अधिक है।
तीन अलग-अलग मोर्चों पर तेज हुआ विरोध
E20 के खिलाफ विरोध अब संगठित स्वरूप लेता दिखाई दे रहा है। फिलहाल यह आंदोलन तीन अलग-अलग स्तरों पर आगे बढ़ रहा है।
1. अरविंद केजरीवाल का ‘नेशनल टाउन हॉल’
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 1 अगस्त को दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में ‘नेशनल टाउन हॉल अगेंस्ट E20’ आयोजित करने की घोषणा की है। उन्होंने प्रधानमंत्री से अपील करते हुए कहा कि इस मुद्दे का समाधान समय रहते किया जाए ताकि यह CJP आंदोलन जैसा बड़ा रूप न ले। उनकी ऑनलाइन याचिका पर 2 लाख से अधिक लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं। टाउन हॉल के बाद PM आवास तक जाने की भी योजना बताई गई है।
2. ट्रांसपोर्ट यूनियनों का संसद मार्च
दिल्ली टैक्सी एंड टूरिस्ट ट्रांसपोर्टर्स एंड टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने 4 अगस्त को संसद मार्च का ऐलान किया है। संघ के अध्यक्ष संजय सम्राट के अनुसार, उद्देश्य सांसदों का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करना है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया प्रचार की जिम्मेदारी युवाओं को सौंपी गई है क्योंकि संगठन के सदस्य स्वयं तकनीक के अधिक जानकार नहीं हैं।
यूनियन की प्रमुख मांगें हैं—
- E20 नीति की स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा।
- पेट्रोल पंपों पर E20 और शुद्ध पेट्रोल दोनों का विकल्प उपलब्ध कराया जाए।
- E20 पर पूर्ण प्रतिबंध उनकी मांग नहीं है।
3. ‘E20 जनता पार्टी’ की सोशल मीडिया मुहिम
CJP के समाप्त होने के तुरंत बाद इंस्टाग्राम और X पर ‘E20 जनता पार्टी’ नाम का एक पेज तेजी से वायरल हुआ। कुछ ही दिनों में इस पेज के 3.28 लाख से अधिक फॉलोअर्स हो गए। यह स्वयं को राजनीतिक दल नहीं बल्कि E20 के खिलाफ जन अभियान बताता है।
इस अभियान की प्रमुख मांगें हैं—
- E20 और शुद्ध पेट्रोल के बीच विकल्प उपलब्ध कराया जाए।
- केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी इस्तीफा दें।
- माइलेज पर प्रभाव की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
यह अभियान भी मीम्स, शॉर्ट वीडियो और व्यंग्यात्मक कंटेंट के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचा रहा है।
क्या CJP जैसा बड़ा आंदोलन बन सकता है?
E20 का मुद्दा उन सभी लोगों को प्रभावित करता है जो वाहन चलाते हैं, इसलिए इसका दायरा काफी व्यापक माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर बढ़ता समर्थन और ट्रांसपोर्ट यूनियनों की सक्रियता यह संकेत देती है कि असंतोष गहराता जा रहा है। हालांकि, तीनों मोर्चे अभी अलग-अलग काम कर रहे हैं। ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने स्पष्ट किया है कि उनका E20 जनता पार्टी या किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है।
उधर नितिन गडकरी ने भी इस नीति से स्वयं को अलग बताते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की अनुमति प्राप्त की है। उनका कहना है कि E20 नीति उनके मंत्रालय के बजाय पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन आती है। इससे आंदोलन का मुख्य निशाना कुछ हद तक बदलता दिखाई दे रहा है।
फिलहाल 1 अगस्त और 4 अगस्त की घटनाओं पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि तीनों मोर्चे एकजुट होते हैं तो यह आंदोलन CJP से भी बड़ा रूप ले सकता है, जबकि अलग-अलग रहने की स्थिति में सरकार के लिए इसे संभालना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है।
E20 फ्यूल पर केंद्र सरकार का क्या कहना है?
केंद्र सरकार ने E20 को सुरक्षित, उन्नत और पर्यावरण के अनुकूल ईंधन बताया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, वाहन निर्माता कंपनियों और उपभोक्ताओं ने इस ईंधन को स्वीकार किया है। सरकार का दावा है कि किसी भी लैब परीक्षण या वास्तविक उपयोग से यह साबित नहीं हुआ कि E20 इंजन को नुकसान पहुंचाता है या घिसाव बढ़ाता है।
हालांकि, 27 जुलाई 2026 को संसद में सरकार ने यह भी कहा कि उसने यह आकलन नहीं किया है कि देश में कितनी गाड़ियां पूरी तरह E20-कंपैटिबल हैं। इसी वजह से इस नीति के लागू होने के तरीके पर नए सवाल उठने लगे हैं। वहीं मारुति सुजुकी ने कहा कि कंपनी ने डेढ़ करोड़ से अधिक ऐसी पुरानी गाड़ियों की सर्विसिंग की जो E20-कंपैटिबल नहीं थीं, लेकिन ईंधन से जुड़ी कोई खराबी सामने नहीं आई। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह उसका स्वयं का सर्वे था।
नितिन गडकरी ने E20 नीति से खुद को अलग बताया
E20 विवाद के बीच नितिन गडकरी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि सोशल मीडिया पर AI-जनरेटेड डीपफेक वीडियो और पोस्ट्स के जरिए उन्हें गलत तरीके से E20 कार्यक्रम से जोड़ा जा रहा है।
उनके अनुसार, E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम सड़क परिवहन मंत्रालय के नहीं बल्कि पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए इस नीति के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें मेटा, X, गूगल और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की अनुमति दी है। इस बीच 28 जुलाई 2026 को कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने लोकसभा में E20 के देशव्यापी रोलआउट के खिलाफ स्थगन प्रस्ताव पेश किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि विपक्ष भी इस मुद्दे को संसद में प्रमुखता से उठाने की तैयारी में है।
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