इस बार होली का त्योहार 7-8 मार्च को मनाया जायेगा, तो वहीं होली के पर्व को लेकर ज्यादा हर्षोल्लास भी देखने को मिल रहा है क्योंकि दो साल बाद कोरोना की स्थिति नियंत्रण में है। होली के दिन लोग टोलियां बनाकर घर से निकलते हैं और दूसरों के घर जाकर रंग लगाते हैं, मिठाई खाते, खिलाते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं।
9 दिन मनाया जाता है होली का त्योहार
होली पर्व वैसे तो नौ दिनों का त्योहार है लेकिन अधिकांश जगहों पर इसे पारंपरिक रूप से दो दिन ही मनाया जाता है। इसके तहत पहले दिन होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। दूसरे दिन, जिसे धुलेंडी कहा जाता है, इस दिन लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं और ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं।
तो वहीं होली के इन 9 दिनों का उल्लास और मस्ती ब्रज क्षेत्र में देखते ही बनती है। बरसाने की लठमार होली काफी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। मथुरा और वृंदावन में तो 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है।
होलिका दहन
होली के आगमन को देखते हुए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ दिनों पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाने का कार्य शुरू हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगुली से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं।
होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व होली के लकड़ी कण्डे आदि कर दिया जाता है। सामूहिक होलिकाओं के साथ−साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार भी अतिरिक्त रूप से होलियां जलाते हैं। होली दहन के समय पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर बांटने की भी परम्परा है।
होलिका दहन पूजन विधि
होलिका दहन से पूर्व महिलाएं एक पात्र में जल और थाली में रोली, चावल, कलावा, गुलाल और नारियल आदि लेकर होलिका माई की पूजा करती हैं। इन सामग्रियों से होली का पूजन किया जाता है। होलिका के चारों ओर परिक्रमा देते हुए सूत लपेटा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतया वर्जित है। यही कारण है कि किसी वर्ष तो होलिका दहन सायं सात आठ बजे ही हो जाता है तो किसी वर्ष प्रातः तीन चार बजे। इस दिन पुरुषों को भी हनुमानजी और भगवान भैरवदेव की विशिष्ट पूजा अवश्य करनी चाहिए। प्रत्येक स्त्री पुरुष को होलिका दहन के समय आग की लपटों के दर्शन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
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