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सोने पर बढ़े आयात शुल्क से ज्वैलरी बाजार सुस्त, कारोबारियों की बढ़ी चिंता

देशभर के सर्राफा बाजारों में इन दिनों रौनक कम होती दिखाई दे रही है। ज्वैलर्स की दुकानों पर ग्राहकों की संख्या घटने लगी है और इस उद्योग से जुड़े लाखों कारीगरों के सामने काम का संकट खड़ा हो गया है। इसकी बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह अपील मानी जा रही है, जिसमें नागरिकों से एक वर्ष तक सोने के आभूषणों की खरीद टालने को कहा गया। वहीं, सरकार ने सोने पर आयात शुल्क भी छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत कर दिया है, जिससे कारोबारियों और ग्राहकों दोनों में चिंता बढ़ गई है।

सरकार ने क्यों बढ़ाया आयात शुल्क

सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव, बढ़ती ऊर्जा कीमतें और रुपये की कमजोरी के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में सोने के आयात को नियंत्रित करना जरूरी हो गया है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है, इसलिए इस फैसले का असर सीधे बाजार और आम ग्राहकों पर दिखाई दे रहा है।

उद्योग संगठनों ने की संयम बरतने की अपील

अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण घरेलू परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि उद्योग को प्रधानमंत्री की अपील का सम्मान करना चाहिए और किसी भी तरह की घबराहट या हड़ताल से बचना चाहिए। उनके मुताबिक कच्चे तेल के बाद सबसे अधिक विदेशी मुद्रा सोने के आयात पर खर्च होती है और सरकार का उद्देश्य भुगतान संतुलन को मजबूत करना है।

करोड़ों लोगों की आजीविका पर असर

आभूषण उद्योग से सीधे और परोक्ष रूप से करीब एक करोड़ लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। इसमें कारीगर, सेल्स स्टाफ, पैकेजिंग, सुरक्षा, बैंकिंग और बीमा जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं। कारोबारियों को डर है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो उद्योग को कोविड काल जैसी आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

शादी-ब्याह की खरीदारी पर भी असर

भारत में सोना केवल निवेश का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी अहम हिस्सा है। खासतौर पर दक्षिण भारत में कसुमालै, झिमिकी और पारंपरिक चूड़ियां पारिवारिक पहचान का प्रतीक मानी जाती हैं। हालांकि बढ़ती कीमतों और महंगे आयात शुल्क के चलते कई परिवार अब अपने खर्चों में बदलाव कर रहे हैं। कुछ परिवार नकली आभूषणों का विकल्प चुन रहे हैं, जबकि केवल मंगलसूत्र और अंगूठियों जैसे जरूरी गहनों को ही सोने में बनवाया जा रहा है।

ग्राहकों में बढ़ी चिंता

मद्रास ज्वैलर्स एंड डायमंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जयंतीलाल चलानी का कहना है कि आयात शुल्क बढ़ने के बाद ग्राहकों में घबराहट का माहौल है। कई लोगों ने भविष्य में कीमत बढ़ने की आशंका को देखते हुए पहले ही खरीदारी कर ली है। कारोबारियों के अनुसार अतिरिक्त शुल्क का बोझ सीधे ग्राहकों पर पड़ेगा, क्योंकि यह राशि अंतिम बिक्री मूल्य में जुड़ जाएगी। इससे ग्राहकों की खरीद क्षमता प्रभावित होगी और बाजार में बिक्री घट सकती है।

पुराने गहनों के एक्सचेंज का बढ़ा ट्रेंड

सोने की लगातार बढ़ती कीमतों ने ग्राहकों की खरीदारी की आदतों को भी बदल दिया है। उद्योग के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग 300 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, जबकि बीते एक साल में ही इसमें करीब 80 प्रतिशत की तेजी आई है। अब बड़ी संख्या में ग्राहक पुराने गहनों को एक्सचेंज कर नए डिजाइन बनवा रहे हैं ताकि उन्हें केवल मेकिंग चार्ज ही देना पड़े। पारंपरिक ज्वैलरी को मॉडर्न डिजाइन में बदलवाने का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है।

युवाओं की पसंद बदल रही

नई पीढ़ी अब भारी सोने के आभूषणों की बजाय हल्के और स्टाइलिश डिजाइन पसंद कर रही है। बाजार में चांदी, हल्के डायमंड ज्वैलरी और 14 या 18 कैरेट के हल्के गहनों की मांग बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि युवा वर्ग अब आभूषणों को केवल निवेश नहीं, बल्कि फैशन और डेली यूज का हिस्सा मानने लगा है। लैब में तैयार किए गए हीरे और मिनिमल डिजाइन वाली ज्वैलरी भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पर फिर चर्चा

सरकार और उद्योग की नजर अब स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पर भी है। इस योजना के तहत लोग घर में रखा सोना जमा कर उस पर ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। न्यूनतम दस ग्राम सोना जमा करने पर लगभग दो से ढाई प्रतिशत तक वार्षिक ब्याज दिया जाता है। सरकार का उद्देश्य घरेलू सोने को आर्थिक प्रणाली में लाकर आयात पर निर्भरता कम करना है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सोना भावनात्मक और पारिवारिक धरोहर माना जाता है, इसलिए लोग अपने पारंपरिक गहनों को जमा कराने में सहज महसूस नहीं करते।

उद्योग ने सरकार को दिए सुझाव

ज्वैलरी उद्योग ने सरकार को कई सुझाव दिए हैं। इनमें पुराने सोने के एक्सचेंज कार्यक्रम को बढ़ावा देना, स्वर्ण जमा योजनाओं को अधिक आकर्षक बनाना और हल्के वजन के गहनों को प्रोत्साहित करना शामिल है। इसके अलावा कर्नाटक की कोलार स्वर्ण खदानों को दोबारा सक्रिय करने की मांग भी उठाई गई है। उद्योग जगत ने यह भी चेतावनी दी है कि अत्यधिक आयात शुल्क बढ़ने से अवैध तस्करी और काले बाजार की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

मंदिरों के सोने को लेकर सरकार ने दी सफाई

हाल ही में सोशल मीडिया पर मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के सोने को सरकारी योजनाओं में शामिल किए जाने की चर्चाएं सामने आई थीं। सरकार ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि मंदिरों के स्वर्ण भंडार को किसी रणनीतिक योजना में शामिल करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें और अफवाहों से बचें।


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