ख़बर संसार किच्छा- दिलीप अरोरा । किच्छा से तिलक को कौन दिलाएगा संजीवनी । राजनितिक पार्टियों मे मानो विरोध का फैशन सा चल गया हो। जहाँ देखो विरोध ही विरोध है। वर्तमान मे हम किच्छा विधान सभा की बात कर रहे है 2022 के चुनाव की तारीख का ऐलान हो चुका है।भाजपा ने कुछ दिन पहले ही अपने प्रत्याक्षी के नाम का ऐलान कर दिया था जिसके बाद भाजपा से विरोध के स्वर बुलंद हो गये थे। तो आज जैसे ही कांग्रेस से तिलक का नाम सामने आया वैसे ही ऊन बहुत से स्थानीय नेताओ का सपना चकनाचूर हो गया जो विधयाकी का खुवाब संजोय बैठे थे। क्योकि पिछली बार भी स्थानीय नेता की मांग के बावजूद कांग्रेस अलाकमान ने स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर हरीश रावत को चुनावी मैदान मे उतारा था। तो वही इस बार सभी को उम्मीद थी की कांग्रेस पार्टी से एक स्थानीय नेता को ही टिकट मिलेगी परन्तु आज फिर ऊन सभी स्थानीय नेताओं को कांग्रेस अलाकमान ने जोर का झटका दिया है।
अब किच्छा से तिलकराज बेहड़ चुनाव लड़ने वाले है। जो की इससे पहले रुद्रपुर से लड़ते आये है किन्तु दोनों बार उनको भाजपा प्रत्याक्षी से हार का सामना करना पड़ा है और ऐसे मे पिछली बार की तरह कांग्रेस मे फिर से भीतर घात होना तय समझा जा रहा है। ऐसे मे तिलक टिकट लाने मे तो कामयाब हो गये है पर क्या वो चुनाव जितने मे भी कामयाब होंगे और क्या वो भीतर घात को रोक पाएंगे।कही उनकी हार की हैट्रिक तो नहीं लग जाएगी।आखिर कैसे मिलेगी दस साल के बाद उनको राजनीती जमीन और संजीवनी।
*भीतर घात कितना पहुचायेगा तिलक को आघात*
पिछली बार कॉंग्रेस खेमे से किच्छा क्षेत्र से टिकट मांगने वालो की लम्बी कतार थी किन्तु हरीश रावतव के आने के बाद ऊन सबके सपने चकना चूर हुए थे और हरीश रावत की हार को चर्चाओ मे माना गया की यह भीतरघात की वजहा से हुआ।
तो क्या तिलक के लिए भी यह चौनौती रहेगी क्या वो इससे पार पा पाएंगे। क्योंकि तिलक की दो बार रुद्रपुर से हार ने उनको बैकफुट पर ला दिया है इससे उनके विरोधी भी मजबूत हुए है।
और वह उनको किच्छा से हराने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।
*किच्छा की जनता बनेगी तिलक के लिए संकटमोचन*
बेहड़ खुद को तराई की राजनीती मे जीवित रखने के लिए संजीवनी की तलाश कर रहे है। और उनकी यह तलाश उनको किच्छा विधान सभा तक ले आयी है।लेकिन ऐसे मे उनके सामने उनकी जीत के महल के आगे बहुत विभीषण आ सकते है जो उनको जीत की कुर्सी से दूर कर दे। लेकिन ऐसे मे तिलक के लिए कौन संकट मोचन बनकर जीत की संजीवनी लाकर देगा क्या यह संजीवनी किच्छा की जनता उनको देगी जिस वजह से उनका राजनितिक कैरियर जिस पर सवाल खड़े हो रहे थे वह पुनः मजबूती से उभरेगा।उनका पिछले दस वर्षो से किच्छा की राजनितिक जमीन से दूर रहना भी तो एक बड़ी चौनौती रही है जो अन्य प्रत्याक्षी को उनसे आगे रखती है।
*रुद्रपुर मे खोया मान ढूंढ़ने किच्छा पहुचे तिलक*
2007 मे ज़ब आखिरी बार तिलक विधायक बने थे तब किच्छा रुद्रपुर एक हो विधान सभा थी।और उन्होने आखिरी बार ज्यादा ध्यान रुद्रपुर पर ही दिया किन्तु ज़ब यह दोनों विधान सभा अलग हुई तब लोगो को लगता रहा की तिलक किच्छा से ही लड़ेंगे लेकिन इन्होने रुद्रपुर की जनता पर भरोसा कर रुद्रपुर को 2012 के चुनाव के लिए चुना जिसका पहला परिणाम उनकी हार के रूप मे आया।और किच्छा सीट पर भाजपा ने कब्जा किया।उसके बाद तिलक के किच्छा से चुनाव लड़ने की उम्मीद दोबारा जगी और 2017 मे चर्चाओ ने जोर पकड़ा की वह किच्छा से चुनाव लड़ने वाले है लेकिन तिलक ने फिर रुद्रपुर को चुना और अपना खोया राजनितिक मान पाने के लिए वहाँ की जनता पर भरोसा किया लेकिन पुनः जनता का जनादेश उनके विरुद्ध ही रहा और वह दूसरी बार भी हार गये।
और भाजपा ने फिर इस सीट पर जीत हासिल की।
अब ज़ब तिलक की दो बार हार हुई तो इस बार भी चर्चाये शुरू हुई उनके यहां से चुनाव लड़ने को और तिलक ने भी रुद्रपुर से जीत की उम्मीद छोड़ और वहाँ की राजनितिक भूमि पर खोया मान वापिस पाने के लिए किच्छा से किस्मत आजमाने की सोची। और इस बार उनको कांग्रेस से टिकट भी मिल गया है। और चर्चाओ को भी बल मिल गया।तो क्या रुद्रपुर की भूमि मे खोया राजनितिक मान तिलक को किच्छा की भूमि और जनता लौटा पायेगी। या फिर इनकी हार की हैट्रिक लग जाएगी।
यह तो आने वाला समय और यहां की जनता व 10 मार्च बता ही देगी।


