नई दिल्ली, खबर संसार: यूक्रेन को दुनिया का ‘ब्रेडबास्केट’ यानि ‘रोटी की टोकरी’ कहा जाता है, क्योंकि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं का उत्पादन यूक्रेन की करता है और यूक्रेन के बाद पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं का उत्पादन रूस करता है, जबकि तीसरे नंबर पर भारत है। भारत के साथ दिक्कत ये है, भारत अपने उत्पादन का ज्यादातर हिस्सा अपने देश में ही खपत करता है, क्योंकि भारत की जनसंख्या यूक्रेन और रूस के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।
वहीं, अब तक रूस और यूक्रेन, संयुक्त रूप से दुनिया के गेहूं के निर्यात का लगभग एक तिहाई हिस्से का उत्पादन करते हैं। लेकिन, युद्ध शुरू होने के बाद स्थिति काफी बदल चुकी है। इससे पहले साल 2008 में ऐसा हुआ था, जब दुनिया के पास गेहूं का स्टॉक सबसे नीचले स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन उस वक्त बात युद्ध की नहीं थी और दुनिया खेमों में नहीं बंटी थी। लेकिन, अभी की स्थिति काफी अलग हो चुकी है और अमेरिका इसके लिए रूस को जिम्मेदार ठहरा रहा है।
रूस है जिम्मेदार- अमेरिका
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने रूस पर भोजन को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। ब्लिंकन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भी संबोधित करते हुए कहा कि, रूस न केवल यूक्रेनियन के लिए बल्कि दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए भोजन को ‘बंधक’ बना रहा है। ब्लिंकन ने कहा कि, ‘रूसी सरकार को लगता है कि हथियार के रूप में भोजन का उपयोग करने से उसे वह हासिल करने में मदद मिलेगी, जो उसे आक्रमण से हासिल नहीं हो पाया है और रूस की सरकार यूक्रेनी लोगों की भावना को तोड़ने के लिए ऐसा काम कर रही है।
सिर्फ 10 हफ्ते का बचा गेहूं
ग्रो इंटेलिजेंस की सीईओ सारा मेनकर ने यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में कहा कि दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की वजह से सूखे की स्थिति बनी है, जिससे गेहूं के उत्पादन पर गहरा असर पड़ा है। मेनकर ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और उर्वरक की कमी से वैश्विक खाद्य आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि, ‘वर्तमान में हमारे पास दुनिया भर में केवल 10 सप्ताह की वैश्विक खपत है। आज स्थितियां 2007 और 2008 से काफी अलग और बदतर हैं’। मेनकर ने कहा कि दुनिया भर की आधिकारिक सरकारी एजेंसियों के अनुमानों से पता चलता है कि गेहूं की सूची वार्षिक खपत का 33% है, लेकिन ग्रो इंटेलिजेंस द्वारा बनाए गए मॉडल से पता चलता है कि यह आंकड़ा वास्तव में 20% के करीब हो सकता है और ये एक ऐसा स्तर है, जो 2007 और 2008 के बाद से नहीं देखा गया है।
भारत में भी गेहूं उत्पादन कम
इन सबके बीच भारत सरकार ने भी गेहूं के निर्यात पर बैन लगा दिया है और उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह भारत में भी इस साल गेहूं के उत्पादन में कमी है। 19 मई को केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा जारी की गई नई रिपोर्ट में कहा गया है कि, खाद्य उत्पादन के तीसरे अग्रिम अनुमान से पता चलता है इस साल गेहूं का उत्पादन लगभग 3% घटकर 106 मिलियन टन हो जाएगा। देश में गेहूं उत्पादन में 2014-15 के बाद पहली गिरावट देखी जाएगी।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने कहा कि पिछले साल के 109.59 मिलियन टन के उत्पादन की तुलना में इस साल भारत का गेहूं उत्पादन तीन प्रतिशत गिरकर 106.41 मिलियन टन होने की संभावना है। साल 2020-21 में गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 109 मिलियन टन हुआ था। केंद्रीय केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने गेहूं के उत्पादन में आई गिरावट के पीछे मौसम और बढ़ती गर्मी को जिम्मेदार बताया है। सरकार ने कहा, कई गेहूं उगाने वाले राज्यों में चिलचिलाती गर्मी ने पैदावार में 20% तक की कटौती की है, जिससे सरकार को लगातार पांच साल की रिकॉर्ड फसल के बाद सर्दियों के अपने अनुमानों को कम करने की संभावना है।
इसे भी पढ़े-अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम व स्पोर्ट्स काॅम्पलेक्स का विशेष मुख्य सचिव ने किया निरीक्षण
हमारे फेसबुक पेज से जुड़ने के लिए


