पीडब्लूडी के अशोक कुमार ने अपने टीम के साथ हरेला पर्व किया वृक्षारोपण जी, हां आज निर्माण खण्ड, लो0नि0वि0, हल्द्वानी द्वारा हरेला वृक्षारोपण अभियान 2024 कार्यक्रम में समस्त अधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा निरीक्षण एवं लो0नि0वि0, परिसर तिकोनिया, हल्द्वानी में विभिन्न प्रजाति के वृक्ष लगाए गये।
इसके अतिरिक्त सहायक अभियन्ता, द्वितीय एवं अन्य कार्मि कों द्वारा लो0नि0वि0 भण्डार गृह लालकुआ में वृक्षारोपण का कार्य सम्पादित किया गया एवं सहायक अभियन्ता, चतुर्थ एवं अन्य कार्मिको द्वारा लो0नि0वि0 निरीक्षण भवन चोरगलिया में भी वृक्षारोपण किया गया।

जाने क्यों मनाया जाता है हरेला
हर साल हरेला पर्व कर्क संक्रांति को श्रावण मास के पहले दिन मनाया जाता है। त्योहार के ठीक 10 दिन पहले हरेला बोया गया लेकिन कुछ लोग 11 दिन का हरेला बोते हैं। यह पर्व उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में विशेष रूप से मनाया जाने वाला है। हरेला घरों में ही लगाया जाता है। हरेला पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है। पहला – चैत्र मास, दूसरा – सावन मास और तीसरा – आश्विन (क्वार) मास में। आइए जानते हैं इस त्योहार अहमियत और किस तरह मनाते हैं यह त्योहार…
सावन हरेला का महत्व
हरेला पर्व प्रकृति से जुड़ा हुआ है। उत्तराखंड में हरेला पर्व से सावन मास की शुरुआत मानी जाती है। सावन मास के हरेला पर्व का विशेष महत्व है सावन भगवान शिव का प्रिय मास है और उत्तराखंड को शिव भूमि भी कहा जाता है। हरेल पर्व के समय शिव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है और धन्यवाद किया जाता है। इस पर्व को शिव पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि हरेला जितना बड़ा होगा, कृषि में उतना ही फायदा देखने को मिलेगा। वैसे तो हरेला को हर घर में बोया जाता है लेकिन कुछ गांव में सामूहिक रूप से स्थानीय ग्राम देवता के मंदिर में भी हरेला बोई जाती है।
7 किस्म का बोया जाता है अनाज
हरेला बोने के लिए हरेला त्योहार से 12 से 15 दिन पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घर के पास साफ जगह से मिट्टी निकाल कर सुखाई जाती है और उसे छानकर रख लिया जाता है। हरेला में 7 या 5 किस्म के अनाज का मिलाकर बोया जाता है। इसमें धान, मक्की, उड़द, गहत, तिल और भट्ट शामिल होते हैं। इसे मंदिर के कोने में रखा जाता है। इसे बोने से लेकर देखभाल तक घर की महिलाएं करती हैं। इस दिन पकवान बनाए जाते हैं।
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