इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब केवल मिसाइल और सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं रहा। यह टकराव अब दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। एक ओर जहां इजरायल को भारी सैन्य खर्च झेलना पड़ रहा है, वहीं ईरान की पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था और अधिक अस्थिर हो गई है।
किस देश की अर्थव्यवस्था पर क्या निर्भर है?
इजरायल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से उच्च तकनीकी क्षेत्र पर टिकी हुई है। गूगल, इंटेल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी 400 से अधिक मल्टीनेशनल कंपनियों के रिसर्च सेंटर यहां मौजूद हैं। इसके साथ ही डायमंड कटिंग, पॉलिशिंग और ग्रीनहाउस तकनीक से खेती भी उसके निर्यात में अहम भूमिका निभाते हैं।
वहीं, ईरान की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार तेल और प्राकृतिक गैस है। 2025 तक उसका लक्ष्य प्रतिदिन 3.1 मिलियन बैरल तेल उत्पादन और 1.6 मिलियन बैरल निर्यात का है। अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के चलते वह ज्यादातर तेल चीन को रियायती दर पर बेचता है।
इकोनॉमिक आंकड़ों की तुलना: कौन मजबूत, कौन कमजोर?
IMF के आंकड़ों के मुताबिक, इजरायल की GDP 583 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है, जबकि ईरान की GDP लगभग 463 अरब डॉलर है। इजरायल में मुद्रास्फीति 3% है, लेकिन ईरान में यह 29.5% तक है। हालांकि, ईरान का विदेशी कर्ज केवल 1.8% है, जबकि इजरायल पर यह जीडीपी का 105% है।
युद्ध की लागत और संभावित भविष्य
कैलकलिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल हर दिन अरबों डॉलर सैन्य खर्च में झोंक रहा है। एफ-35 लड़ाकू विमानों की तैनाती, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और रिजर्व सैनिकों की बहाली से उसकी आर्थिक गतिविधियां ठप हो रही हैं। ईरान की स्थिति भी कठिन है। अगर उसके तेल उत्पादन या रिफाइनरी ढांचे को नुकसान पहुंचा तो उसका 40% तक राजस्व कम हो सकता है। ईरानी मुद्रा रियाल की वैल्यू 2024 में 50% तक गिर चुकी है।
निष्कर्ष: कौन ज्यादा जोखिम में?
शॉर्ट टर्म में इजरायल को भारी नुकसान हो रहा है — उसका टेक सेक्टर, टूरिज्म और एक्सपोर्ट सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से प्रतिबंधों के लिए तैयार रही है, लेकिन लॉन्ग टर्म में उसके तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हुआ तो वह भी गहरे संकट में आ सकता है। इस संघर्ष का कोई भी आर्थिक विजेता नहीं है। यदि युद्ध लंबा चला, तो यह पश्चिम एशिया की पूरी आर्थिक स्थिरता को खतरे में डाल सकता है।
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