Monday, January 17, 2022
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यूपी को 4 मुख्यमंंत्री देनी वाली बीएसपी (BSP) आज हाशिए पर जानिए क्यों

नई दिल्ली, खबर संसार। यूपी में पिछले 3 दशकों में 4 बार यूपी को मुख्यमंत्री देने वाली बीएसपी (BSP) इस बार के चुनाव में है कहां। कभी यूपी में बीजेपी को 51 सीटों पर सिमेट देने वाली बीएसपी आज खुद सूबे की सियासत में क्यों हाशिए पर दिख रही है?

यूपी में इक्का-दुक्का चुनावों को छोड़कर हर बार बीएसपी एकला चलो रे की नीति पर चली है। 90 के दशक में कुख्यात गेस्ट हाउस कांड के बाद समाजवादी पार्टी से गठबंधन टूटने का अनुभव इतना कड़वा रहा कि मायावती ने चुनाव पूर्व गठबंधनों से एक तरह से तौबा कर लिया। बीजेपी (BSP) के साथ चुनाव बाद गठबंधन कर भले ही मायावती ने सरकार बनाई हो लेकिन कभी चुनाव से पहले गठबंधन नहीं किया।

2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने समाजवादी पार्टी से बहुचर्चित गठबंधन किया लेकिन प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा और जल्द ही गठबंधन टूट भी गया। 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव भी बीएसपी अकेले ही लड़ने जा रही है। खास बात ये है कि इस बार बीएसपी चुनाव घोषणा पत्र भी जारी नहीं करेगी।

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1993 में राष्ट्रीय राजनीति में पहली बार सुनाई दी बीएसपी की धमक

1984 में कांशी राम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। उन्होंने अपने जीते जी मायावती को सियासी वारिस बनाया। 1993 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी की पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर धमक दिखी जब वह यूपी विधानसभा चुनाव में 67 सीटों पर जीत हासिल की। यूपी में करीब 21 प्रतिशत दलित वोटर हैं। इसके अलावा 20 प्रतिशत के करीब मुस्लिम मतदाता हैं। बीएसपी की ताकत दलित+मुस्लिम समीकरण रहा।

2 साल बाद ही 1995 में मायावती पहली बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं। पहली दलित महिला जो किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि, वह 4 महीने तक ही सत्ता में रहीं। 1997 में वह दूसरी बार सीएम बनीं और इस बार भी महज 6 महीने कुर्सी पर रह पाईं। 2002 में मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं और इस बार वह 15 महीने तक मुख्यमंत्री रहीं।

2007 में बीएसपी का ऐतिहासिक प्रदर्शन, फिर ढलान

2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी (BSP) का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा। 403 में से 206 सीटों पर जीत हासिल कर पहली बार बीएसपी पूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आई। वोट शेयर 30.43 प्रतिशत रहा। इसका श्रेय बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग को दिया जाता है। सतीश चंद्र मिश्र को आगे कर बीएसपी गैरदलित खासकर ब्राह्मणों को साधने में कामयाब रही।

दलित+मुस्लिम+ब्राह्मण फॉर्म्युले से बीएसपी ने यूपी में ढाई दशकों से चले आ रहे गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म किया। लेकिन उसके बाद से बीएसपी के प्रदर्शन में तेजी से गिरावट का दौर शुरू हुआ। 2012 में बीएसपी सिर्फ 80 सीटें जीत सकी। वोटशेयर घटकर 25.95 प्रतिशत रह गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी खाता तक नहीं खोल पाई। 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी 19 सीटों पर सिमट गई और वोट शेयर गिरकर 22.24 प्रतिशत रह गया।

BSP की ‘दुर्गति’ की वजह

बतौर मुख्यमंत्री मायावती का 2007 से 2012 का कार्यकाल नकारात्मक वजहों से चर्चा में रहा। विरोधी उन्हें ‘दौलत की बेटी’ कहने लगे। जन्मदिन और यहां तक कि चुनावी सभाओं में भी मायावती का स्वागत ‘नोटों की माला’ पहनाकर होने लगा। एनआरएचएम घोटाले में उनके मंत्रियों और विधायकों का नाम आने लगा। एक के बाद एक सीएमओ की हत्याएं होने लगीं।

मायावती ने जो पार्क बनवाएं उनमें दलित महापुरुषों के साथ अपनी भी मूर्तियां लगवाईं। हाथियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगवाई गईं। विरोधी उनकी छवि विकास के बजाय हाथियों की मूर्तियों पर पानी की तरह पैसे बहाने वाली नेता की बनाने में कामयाब हो गए। 2012 में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। 2014 में मोदी लहर में बीएसपी उड़ गई। लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाई। गैर-जाटव दलित वोट खिसककर बीजेपी के पास चला गया। सत्ता से दूर होने के बाद मायावती के भरोसेमंद नेता एक-एक कर बीएसपी छोड़ने लगे।

क्या कमबैक कर सकती हैं मायावती?

वैसे आंकड़ों को देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी 19 प्रतिशत वोट शेयर के साथ यूपी में दूसरे नंबर की पार्टी है। 10 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही लेकिन उसका श्रेय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जाता है। बीएसपी अपने बुरे दौर में भी करीब 20 प्रतिशत वोटशेयर बरकरार रखने में कामयाब रही है। यानी उसे पूरी तरह नजरअंदाज तो नहीं ही किया जा सकता।

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