खबर संसार, बनारस। gyan Lab बताती किस जीव के पूर्वजों की उत्पत्ति कहां से हुई. जी हा बाबा विश्वनाथ की नगरी में वैज्ञानिक शोध से पता चलता है कि किस जीव के पूर्वजों की उत्पत्ति कहां से हुई थी.काशी में एक डीएनए की प्रयोगशाला है। दिन भर X व Y क्रोमोसोम्स में उलझते-सुलझते इस लैब में मौजूद वैज्ञानिक दुनिया वालों को उनके कई सौ साल पहले के पूर्वज खोज कर बताते हैं. काशी में बैठे लोगों का कौन-सा डीएनए उन्हें कश्मीरी पंडितों से जोड़ता है, और कैसे लद्दाख वाले जीन्स चीनी नहीं, भारतीय ज्यादा हैं, ऐसे तमाम सवालों के जवाब यहीं कुरेदे जाते हैं।
ज्ञान लेब बताती किस जीव के पूर्वजों की उत्पत्ति कहां से हुई
gyan Lab की खासियत है. मेडिकल, क्रिमिनल और विवादों से जुड़े मसलों को डीएनए से पूर्वज पहचानकर सुलझाने में अदालतों और सरकारों की मदद करती है.अंग्रेजों ने जो पढ़ाया और मुगलों ने जो दावा किया उसकी असलियत पता करने के लिए वैज्ञानिकों ने बकायदा दर्जन भर शोध किए हैं. आर्य भारतीय नहीं हैं, इस थ्योरी को पलट दिया. वैसे इन्हें हासिल तमगों में आरुषी हत्याकांड जैसे देश में चर्चित क्राइम, रामायण के समय की जनजातियों को श्रीलंका तक खोज लेना और कोविड में इम्युनिटी की कहानी बता देना सबसे ऊपर है।
इस लैब में ही पता चला कि हमारे आपके पूर्वजों पर निर्भर करता है कि आपको कोविड होगा या नहीं, और होगा तो उसका कितना असर होगा। हार्ट अटैक किसे आएगा और 4.5 प्रतिशत भारतीयों में कार्डियक अरेस्ट का सात गुना ज्यादा खतरा है, ज्ञान लैब इसे भी पता लगा चुकी है। देश में इस तरह की पांच लैब हैं। अन्य लैब में औसतन दो से तीन, तो ज्ञान लैब में 12 से 15 शोधपत्र प्रकाशित होते हैं। ज्ञान लैब को सबसे ज्यादा ख्याति चार्ली चैप्लिन के भारतीय संबंध का पता लगाने पर मिली। सबसे विवादित शोध था रोहिंग्या और संथाल समुदाय का। बात चार साल पहले की है, संथाल समुदाय के शोध के बाद नक्सली वैज्ञानिकों को खोजते हुए ज्ञान लैब तक पहुंच गए थे. पता चला कि घोड़ा भारत में 16 हजार वर्षों से है.
कोविड में इम्युनिटी की कहानी बता देना सबसे ऊपर है इस लैब में
बीएचयू की ज्ञान लैब मेडिकल, क्रिमिनल मसलों को सुलझाने में अदालतों और सरकारों की मदद करती है. लैब में खास कुंडली भी तैयार होती है, जो शादी से पहले वर-वधू के स्वास्थ्य मामले बता सकती है। वैज्ञानिकों ने महाकुंभ के दौरान नागा साधुओं और कल्पवासियों के भी सैंपल जुटाए हैं। एक सैंपल लेने में चार से पांच हजार रुपये तक खर्च आता है। लैब के जीन्स-डीएनए वाले खजाने में 50 हजार साल पुराने सैंपल भी मौजूद हैं। लैब के प्रमुख हैं डॉ. ज्ञानेश्वर चौबे। पीएचडी कर रहे आठ शोधार्थी, दो पोस्ट डॉक्टरेट विद्यार्थी और चार लैब स्टाफ, पुरखों को पहचानने वाले इस पावर हाउस का हिस्सा है
इसे भी पढ़े- पवन खेड़ा की कोर्ट में होगी पेशी, ट्रांजिट रिमांड पर असम ले जाएगी पुलिस
