भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता में डेयरी और कृषि बड़े विवाद के मुद्दे बन गए हैं। अमेरिका भारत से डेयरी बाज़ार खोलने का दबाव डाल रहा है, जबकि भारत ने अमेरिकी डेयरी उत्पादों में ‘मांसाहारी दूध’ को लेकर सख्त आपत्ति जताई है। भारत का कहना है कि मांस या रक्त खिलाई गई गायों से निकला दूध भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी डेयरी से सस्ते उत्पादों के आयात से न केवल किसानों की आजीविका पर असर पड़ेगा बल्कि देश को सालाना भारी आर्थिक नुकसान भी हो सकता है।
भारत की चिंता: धार्मिक आस्थाओं से समझौता नहीं
भारत का लगभग 38% जनसंख्या शाकाहारी है और हिंदू धर्म में दूध और घी का धार्मिक महत्व भी है। यही वजह है कि भारत मांग कर रहा है कि अमेरिका यह प्रमाणित करे कि आयातित दूध ऐसी गायों से आया हो जिन्हें मांस या रक्त नहीं खिलाया गया। भारत ने इस शर्त को अपनी “लाल रेखा” बताया है और इसे पार न करने की चेतावनी दी है।
अमेरिकी दबाव से घरेलू उद्योग को खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए बाज़ार खोलता है तो यह छोटे किसानों और घरेलू उद्योग के लिए भारी नुकसान का सौदा हो सकता है। एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, इससे भारत को सालाना करीब 1.03 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। अमेरिका जहां पिछले साल 8.22 अरब डॉलर का डेयरी निर्यातक था, वहीं भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक और उपभोक्ता है।
किसानों की आजीविका पर भी संकट
भारतीय किसान संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि सस्ते अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आने से बाजार में दाम गिरेंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। महाराष्ट्र के एक किसान ने कहा कि सरकार को घरेलू किसानों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।
भारत का डेयरी उद्योग न केवल अर्थव्यवस्था में 2.5-3% योगदान देता है बल्कि करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी भी इससे जुड़ी है। ऐसे में सरकार के लिए उपभोक्ताओं की भावनाओं और किसानों की आजीविका के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।
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