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जानें काशी में ही क्यों मनाया जाता है देव दीपावली का यह पर्व

देव दीपावली का आयोजन हर वर्ष दीवाली के 15 दिन के बाद होता है। इस वर्ष dev-deepawali का ये पर्व आठ नवंबर को है, मगर इसी दिन चंद्र ग्रहण भी है। इस वर्ष के अंतिम चंद्र ग्रहण के कारण इस बार देव दीपवली एक दिन पहले यानी सात नवंबर को मनाए जाएगी।

पौराणिक मान्यताओं के कारण देव दीपावली का काफी अधिक महत्व है। माना जाता है कि देव दीपावली (जिसे त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है) के शुभ मौके पर ही देवता धरती पर उतरते है। इस मौके पर देवताओं के स्वागत के लिए देव दीपावली का आयोजन किया जाता है।

गंगा स्नान का है महत्व

गंगा स्नान का हिंदू धर्म में काफी महत्व बताया गया है। इस दिन जो भी व्यक्ति पवित्र गंगा नदी में स्नान करता है उसका भी काफी महत्व होता है। देव दीपावली के शुभ मौके पर गंगा नदी में डुबकी लगाने से श्रद्धालुओं के सभी पाप खत्म हो जाते है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान का महत्व बेहद अधिक होता है। इस खास मौके के लिए गंगा नदी के तट पर भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते है।

जानें काशी में क्यों मनती है देव दीपावली

कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन ही देव दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं की मानें तो कार्तिक पूर्णिमा के विशेष महत्व के पीछे पौराणिक कथा भी है। दरअसल एक राक्षस था जिसका नाम त्रिपुरासुर था। उसने ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि उसे कोई देवता, पुरुष, स्त्री, जीव, जंतु, पक्षी, निशाचर मार ना सके। इस वरदान को पाने के बाद त्रिपुरासुर अमर हो गया और उसने दुनिया पर अत्यातार शुरू कर दिया।

उसके अत्याचारों से हर कोई परेशान था और उससे मुक्ति चाहते थे। राक्षस से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की आराधना की गई जिसके बाद उन्होंने त्रिपुरासुर राक्षस का वध अर्धनारीश्वर अवतार में कार्तिक पूर्णिमा के दिन किया था। इस प्रकार से भगवान शिव ने त्रिपुरासुर के आतंक से दुनिया को मुक्ति दिलाई। यही कारण है कि भगवान शिव को भी त्रिपुरारी के नाम से जाना जाता है।

त्रिपुरासुर से मुक्ति पाने के बाद देवओं ने खुशी में काशी में दीप जलाए थे। इसके बाद हर वर्ष काशी में दीपोत्सव मनाया जाता है। काशी में dev-deepawali के मौके पर अलग ही उल्लास देखने को मिलता है। देव दीपावली के मौके पर काशी के रविदास घाट से लेरप राजघाट तक लाखों दीये जलाकर इस उत्सव को मनाया जाता है।

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