Saturday, February 14, 2026
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रतले प्रोजेक्ट पर बड़ा अलर्ट: 29 कर्मचारियों पर आतंकी लिंक का शक

रतले प्रोजेक्ट पर बड़ा अलर्ट: 29 कर्मचारियों पर आतंकी लिंक का शक जी, हां रणनीतिक और राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाएँ हमेशा से दुश्मन देशों और आतंकी संगठनों के निशाने पर रही हैं। लेकिन हालात तब ज्यादा गंभीर हो जाते हैं, जब खतरा बाहरी नहीं बल्कि परियोजना के भीतर से पैदा होने लगे। ऐसे मामलों में यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बन जाता है।

पुलिस पत्र ने खोली चौंकाने वाली परतें

जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) को भेजे गए एक पत्र ने इसी आशंका को हकीकत में बदल दिया है। 1 नवंबर को किश्तवाड़ के एसएसपी नरेश सिंह ने कंपनी के जनरल मैनेजर को पत्र लिखकर आगाह किया कि द्राबशल्ला क्षेत्र में निर्माणाधीन 850 मेगावाट की रतले जलविद्युत परियोजना में काम कर रहे 29 कर्मचारियों की पृष्ठभूमि संदिग्ध पाई गई है।

आतंकी संपर्क और आपराधिक रिकॉर्ड का आरोप

पुलिस सत्यापन में सामने आया कि इन कर्मचारियों में से पांच के कथित तौर पर आतंकी संपर्क हैं। इनमें एक कुख्यात आतंकी के तीन रिश्तेदार, एक संदिग्ध ओवरग्राउंड वर्कर का बेटा और एक आत्मसमर्पित आतंकी का बेटा शामिल है। इसके अलावा एक व्यक्ति पर जलस्रोत दूषित करने और दस्तावेजों की जालसाजी का आरोप है, जबकि शेष 23 कर्मचारियों पर अवैध घुसपैठ और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसे आपराधिक मामले दर्ज हैं।

विधायक बनाम कंपनी, सियासी तकरार तेज

इस मामले ने तब राजनीतिक रंग ले लिया जब किश्तवाड़ से भाजपा विधायक शगुन परिहार ने कहा कि पुलिस का पत्र उनके आरोपों की पुष्टि करता है। विवाद की शुरुआत तब हुई थी जब MEIL के सीओओ हरपाल सिंह ने परियोजना में देरी के लिए विधायक को जिम्मेदार ठहराया था।

कंपनी का पक्ष और बढ़ते सवाल

कंपनी ने पुलिस पत्र मिलने की पुष्टि करते हुए निगरानी बढ़ाने की बात कही है, लेकिन यह भी तर्क दिया कि बिना अदालत में दोष सिद्ध हुए कार्रवाई करना कानूनी रूप से मुश्किल है। हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में “संदेह का लाभ” भी भारी जोखिम बन सकता है।

विकास, सुरक्षा और राजनीति का खतरनाक संगम

करीब 3,700 करोड़ रुपये की लागत वाली यह परियोजना पहले ही दो साल की देरी का शिकार है। अब यह विवाद जम्मू-कश्मीर में विकास, सुरक्षा और राजनीति के जटिल रिश्ते को उजागर करता है। सवाल यही है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स में किसी भी स्तर की लापरवाही स्वीकार्य हो सकती है?


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