नई दिल्ली: बांग्लादेश में तारिक रहमान की अगुवाई में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में हुए चुनावों में BNP गठबंधन ने जातीय संसद में दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर लिया है। इस राजनीतिक बदलाव ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों और रणनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
पिछला रिकॉर्ड क्यों चिंता बढ़ाता है?
2001 से 2006 के बीच खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP सरकार पर भारत-विरोधी संगठनों को संरक्षण देने के आरोप लगे थे। विशेषकर असम आधारित उग्रवादी संगठन उल्फा को कथित समर्थन और 2004 का चटगांव हथियार कांड आज भी सुरक्षा विश्लेषकों की स्मृति में ताजा है। उस दौर में बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत के कई अलगाववादी संगठनों के लिए सुरक्षित पनाहगाह माना जाता था।
शेख हसीना काल में क्या बदला?
2009 में शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद ढाका ने भारत-विरोधी तत्वों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। कई उग्रवादियों को गिरफ्तार कर भारत को सौंपा गया, जिससे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार आया और सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ।
क्या बदल चुका है तारिक रहमान का रुख?
लंदन से निर्वासन खत्म कर हाल ही में ढाका लौटे तारिक रहमान ने अपने भाषणों में राष्ट्रीय सौहार्द और 1971 के मुक्ति संग्राम के प्रति समर्थन जताया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संकेत है कि BNP की सोच दो दशक पहले जैसी नहीं रही।
2002 की रिपोर्टों में यह चर्चा रही थी कि BNP के भीतर ही भारत-विरोधी संगठनों को संरक्षण देने पर मतभेद थे। माना जाता है कि तारिक रहमान भारत के साथ बेहतर आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के पक्षधर रहे हैं।
भारत के लिए आगे की चुनौती
हालांकि अतीत का अनुभव भारत को सतर्क रहने की सलाह देता है, लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि ढाका और दिल्ली दोनों ही टकराव की जगह संवाद का रास्ता चुन सकते हैं। आने वाले महीनों में दोनों देशों के आधिकारिक बयानों और सुरक्षा सहयोग की दिशा से वास्तविक तस्वीर साफ होगी।
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