भारत ने लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए नए संसद भवन बनवाया गया था। सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के प्रमुख हिस्से के रूप में निर्मित यह भवन आधुनिक तकनीक और भारतीय परंपरा का संगम है। आर्किटेक्ट बिमल पटेल द्वारा डिज़ाइन की गई यह इमारत वर्ष 2019 में शुरू हुई निर्माण प्रक्रिया का परिणाम है और इसे आने वाले 150 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
नई संसद की जरूरत क्यों पड़ी?
पुराना संसद भवन उस दौर में बना था जब सांसदों की संख्या सीमित थी। वर्ष 2026 के बाद संभावित परिसीमन के चलते लोकसभा सीटों की संख्या 545 से बढ़ सकती है, जबकि पुराने भवन में पर्याप्त स्थान नहीं था।
इसके अलावा, जल आपूर्ति, सीवर लाइन, एयर कंडीशनिंग और अग्निशमन जैसी व्यवस्थाएँ जर्जर हो चुकी थीं। सुरक्षा भी चिंता का विषय थी, क्योंकि दिल्ली भूकंपीय ज़ोन-V में आती है, जबकि पुरानी इमारत ज़ोन-II मानकों के अनुसार बनी थी। कर्मचारियों और संसदीय कार्यों के लिए भी पर्याप्त कार्यक्षेत्र की कमी महसूस की जा रही थी।
नई संसद की खासियतें
त्रिकोणीय आकार में बना नया संसद भवन हरित निर्माण तकनीक से तैयार किया गया है, जिससे बिजली की खपत में लगभग 30% कमी आने की उम्मीद है। वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण जैसी व्यवस्थाएँ इसे पर्यावरण अनुकूल बनाती हैं।
लोकसभा कक्ष मोर थीम पर आधारित है और इसमें 888 सीटें हैं, जिन्हें संयुक्त सत्र में 1,272 तक बढ़ाया जा सकता है। राज्यसभा कक्ष कमल थीम पर आधारित है और इसकी क्षमता 384 सदस्यों तक है। अत्याधुनिक डिजिटल सिस्टम, टच स्क्रीन डेस्क और बेहतर ध्वनिकी इसकी तकनीकी विशेषताएँ हैं।
संस्कृति, विरासत और तकनीक का संगम
- संविधान सभागार में भारत के लोकतांत्रिक इतिहास को प्रदर्शित किया गया है। राजस्थान का बलुआ पत्थर, नागपुर की लकड़ी और भदोही के कालीन जैसी सामग्री राष्ट्रीय एकता को दर्शाती है।
- भवन के शीर्ष पर 9,500 किलोग्राम वजनी अशोक स्तंभ स्थापित है। ‘सत्यमेव जयते’ अंकित प्रवेश द्वार और लोकसभा कक्ष में स्थापित ‘सेन्गोल’ स्वतंत्रता और परंपरा के प्रतीक हैं।
- नई संसद में पूर्ण डिजिटलीकरण किया गया है और यहाँ स्थापित फौकॉल्ट पेंडुलम वैज्ञानिक चेतना का प्रतीक है।
- नया संसद भवन केवल एक संरचना नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सशक्त प्रतीक बनकर उभरा है।
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