नई दिल्ली: विदेशी फंडिंग को लेकर केंद्र सरकार FCRA (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) में संशोधन की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित संशोधन बिल को लेकर विपक्ष, धार्मिक संगठनों और कई गैर-सरकारी संस्थाओं ने आपत्तियां जताई हैं। वहीं, अमेरिका से भी इस पर प्रतिक्रिया सामने आई है। 12 अगस्त 2026 को संसद में इस बिल पर चर्चा होने की संभावना है।
FCRA क्या है?
FCRA विदेशी अंशदान को नियंत्रित करने वाला कानून है। इसका उद्देश्य यह तय करना है कि कौन विदेशी फंड प्राप्त कर सकता है, उसका उपयोग कैसे होगा और उसका लेखा-जोखा किस तरह रखा जाएगा। यह कानून उन गतिविधियों पर भी रोक लगाने का प्रावधान करता है जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।
सरकार क्या बदलाव चाहती है?
प्रस्तावित संशोधन के तहत संस्थाओं को विदेशी फंड के उपयोग का उद्देश्य और क्षेत्र स्पष्ट बताना होगा। साथ ही, एक ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ बनाने का प्रस्ताव है, जो कुछ परिस्थितियों में विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का प्रबंधन कर सकेगी। रजिस्ट्रेशन का नवीनीकरण नहीं होने पर ‘सीजेशन’ का प्रावधान, न्यूनतम वार्षिक खर्च की शर्त, अधिकतम सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करना तथा धार्मिक स्थलों का स्वरूप यथावत रखने जैसे प्रावधान भी प्रस्तावित हैं।
विवाद और सरकार का पक्ष
सबसे अधिक विवाद संपत्ति से जुड़े प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर है। विरोध करने वाले पक्षों का कहना है कि इससे विदेशी फंड पर चलने वाले स्कूल, अस्पताल, चर्च, मस्जिद और अन्य संस्थाओं पर असर पड़ सकता है। वहीं, गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि बिल धर्म-निरपेक्ष है, किसी धर्म विशेष को निशाना नहीं बनाता और इसे पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जाएगा।
PIB ने भी स्पष्ट किया है कि संबंधित प्रावधान केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू होंगे।12 अगस्त 2026 को इस बिल पर संसद में चर्चा होने की संभावना है। फिलहाल यह कानून नहीं बना है और चर्चा के बाद ही इसकी आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
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