मिडिल ईस्ट में अमेरिका-ईरान तनाव लगातार बढ़ रहा है (What), हाल के दिनों में (When) वैश्विक मंच पर (Where) अमेरिका के सहयोगी देश (Who) उससे दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। इसका कारण क्षेत्रीय स्थिरता और युद्ध से बचना है (Why), जबकि दूसरी ओर ईरान को रूस, चीन जैसे देशों का समर्थन मिल रहा है (How)।
अमेरिका को सहयोगियों का साथ क्यों नहीं मिला?
मिडिल ईस्ट संघर्ष में अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों से उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिल रहा है।
- जर्मनी, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम जैसे नाटो देशों ने सैन्य भागीदारी से इनकार कर दिया है।
- फ्रांस ने साफ कहा है कि वह अतिरिक्त सैनिक नहीं भेजेगा।
- इन देशों का फोकस युद्ध के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने पर है।
इजरायल का बड़ा फैसला
इजरायल, जो आमतौर पर अमेरिका का करीबी सहयोगी माना जाता है, उसने भी बड़ा रुख अपनाया है।
- इजरायल ने ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन के लिए सेना भेजने से इनकार किया।
- रिपोर्ट्स के अनुसार, उसकी सेना पहले से ही दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ अभियानों में व्यस्त है।
अन्य देशों ने भी बनाया दूरी
अमेरिका को सिर्फ यूरोप ही नहीं, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र से भी झटका लगा है।
- ऑस्ट्रेलिया और जापान ने नौसैनिक या सैन्य सहयोग देने से इनकार किया।
- इटली ने अमेरिका की रणनीति पर सवाल उठाए और अंतरराष्ट्रीय कानून का मुद्दा उठाया।
- न्यूजीलैंड ने भी अमेरिकी नेतृत्व वाली पहलों से दूरी बनाई।
ईरान को किन देशों का मिल रहा समर्थन?
जहां अमेरिका अलग-थलग नजर आ रहा है, वहीं ईरान अपने गठजोड़ मजबूत कर रहा है।
- रूस: रणनीतिक साझेदारी और रक्षा प्रणाली की आपूर्ति
- चीन: ईरान का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार, तेल खरीद में अग्रणी
- उत्तर कोरिया: सैन्य और तकनीकी सहयोग
यह समूह पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने वाले एक बड़े भू-राजनीतिक गुट के रूप में देखा जा रहा है।
मुस्लिम देशों का संतुलित रुख
कई प्रमुख मुस्लिम देश इस संघर्ष में तटस्थ बने हुए हैं।
- पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की ने किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया
- सभी देशों ने कूटनीतिक समाधान और तनाव कम करने पर जोर दिया
- अमेरिका को सहयोगी देशों से सीमित समर्थन
- नाटो देश युद्ध से दूर रहना चाहते हैं
- इजरायल ने भी ग्राउंड ऑपरेशन से किया इनकार
- रूस, चीन और उत्तर कोरिया ईरान के साथ
- मुस्लिम देश कूटनीति पर जोर दे रहे हैं
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