ईरान-इजरायल के बीच जारी युद्ध और इसमें अमेरिका की सक्रिय भागीदारी ने दुनिया के तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। इस तनाव का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 85 देशों में ईंधन महंगा हो चुका है और कई जगहों पर कीमतों में 15% से 50% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
यह उछाल ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही महंगाई और धीमी ग्रोथ के दबाव से जूझ रही है। मध्य-पूर्व क्षेत्र तेल आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है, इसलिए यहां किसी भी सैन्य गतिविधि का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तेजी से दिखाई देता है।
किन देशों में सबसे ज्यादा असर?
ईंधन कीमतों में सबसे अधिक बढ़ोतरी उन देशों में देखी गई है जो तेल आयात पर निर्भर हैं या पहले से आर्थिक असंतुलन का सामना कर रहे हैं। इसके चलते परिवहन महंगा हुआ है, जिससे खाद्य पदार्थों और जरूरी सामान की कीमतें भी बढ़ी हैं।
प्रमुख देशों में अनुमानित बढ़ोतरी:
- कंबोडिया – 68% (सबसे ज्यादा)
- वियतनाम – 50%
- मिस्र – 35% से 50%
- नाइजीरिया – 35%
- लाओस – 33%
- कनाडा – 28%
- ऑस्ट्रेलिया – 15% से 25%
- यूरोप के देश – 20% से 40%
- अफ्रीकी आयातक देश – 25% से 45%
- एशियाई बाजार – 15% से 30%
मिस्र पर सबसे ज्यादा आर्थिक दबाव
मिस्र पर इस संकट का सबसे अधिक असर देखने को मिला है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि देश का ऊर्जा आयात बिल दोगुना से भी ज्यादा हो गया है। इससे सरकारी बजट, विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा पर दबाव बढ़ गया है।
ऊर्जा महंगी होने का असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बिजली दरें, औद्योगिक लागत और पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी महंगे हो जाते हैं। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
विकसित देशों में भी बढ़ी चिंता
यह संकट सिर्फ विकासशील देशों तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी महंगाई और धीमी आर्थिक वृद्धि को लेकर चिंतित हैं। वहां के आर्थिक विश्लेषण में संकेत मिला है कि युद्ध के चलते महंगाई बढ़ सकती है और GDP पर दबाव आ सकता है।
तेल कीमतों की अस्थिरता का असर शेयर बाजार और मुद्रा विनिमय दरों पर भी दिखाई दे रहा है। कई केंद्रीय बैंक अब अपनी नीतियों को लेकर सतर्क हो गए हैं।
भारत पर क्या असर?
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। देश अपनी कुल जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का असर यहां भी पड़ना तय है।
हालांकि, भारत ने फिलहाल इस स्थिति को “मैनेज्ड शॉक” की रणनीति से संभालने की कोशिश की है। यानी सरकार सीधे जनता पर बोझ डालने के बजाय टैक्स और नीतिगत संतुलन के जरिए असर को नियंत्रित कर रही है।
आम लोगों पर सीधा असर
पेट्रोल-डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर हर रोज इस्तेमाल होने वाली चीजों पर पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ती है और खासतौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
मध्य-पूर्व तनाव और तेल बाजार का पुराना रिश्ता
इतिहास गवाह है कि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का असर हमेशा तेल कीमतों पर पड़ा है। मौजूदा हालात ने एक बार फिर दिखाया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ऊर्जा आपूर्ति पर कितनी निर्भर है।
अगर यह संघर्ष लंबा चलता है, तो तेल कीमतों में और उछाल आ सकता है, जिससे वैश्विक आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ सकती है और महंगाई और बढ़ सकती है।
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