हल्द्वानी। बनभूलपुरा से जुड़ा बहुचर्चित हल्द्वानी रेलवे भूमि विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को होने वाली सुनवाई आगे बढ़ाते हुए अब 10 दिसंबर की तारीख तय की है। यह मामला इसलिए संवेदनशील है क्योंकि इसके फैसले से हल्द्वानी के लगभग 50,000 से अधिक लोगों पर सीधा असर पड़ सकता है। नई तारीख घोषित होते ही स्थानीय प्रशासन, रेलवे विभाग और पुलिस ने फिर से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब रेलवे ने दावा किया कि बनभूलपुरा क्षेत्र की 30हेक्टेर एकड़ भूमि उसकी है और इस पर 4,365 घरों व अन्य निर्माण अवैध रूप से बनाए गए हैं। रेलवे का कहना है कि भविष्य में रेललाइन विस्तार और अन्य प्रोजेक्ट के लिए इस भूमि को खाली कराना जरूरी है।
दूसरी ओर निवासियों ने इस दावे को गलत बताया। उनका कहना है कि वे दशकों से यहां रह रहे हैं, कई परिवारों का इतिहास यहां आज़ादी से पहले का बताया जाता है। लोगों के पास बिजली, पानी, टैक्स रिसीट जैसे दस्तावेज भी हैं, जिनका हवाला देकर वे अपनी मौजूदगी को वैध बताते हैं।
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कोर्ट तक मामला कैसे पहुंचा?
2013 में एक जनहित याचिका दायर हुई थी जिसमें कहा गया था कि रेलवे भूमि पर अवैध कब्जे हैं। बाद में 2022 में हाई कोर्ट ने सभी अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया, जिसके बाद हालात तनावपूर्ण हो गए।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने 2जनवरी 2023 में हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह “मानवीय समस्या” है और हजारों लोगों को अचानक बेघर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सरकार और रेलवे से व्यावहारिक समाधान व पुनर्वास योजना पर काम करने के निर्देश दिए।
ताज़ा अपडेट और प्रशासनिक तैयारियां
जैसे ही आज की सुनवाई टली और अगली तारीख तय हुई, हल्द्वानी प्रशासन ने फिर से सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के आदेश जारी कर दिए। पुलिस, इंटेलिजेंस और प्रशासनिक टीमें संभावित स्थिति को देखते हुए अलर्ट मोड में हैं। रेलवे विभाग ने भी भूमि सीमांकन और दस्तावेजी तैयारी बढ़ा दी है।
स्थानीय लोग भी सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई से उम्मीद लगाए हुए हैं कि अदालत उनके पुनर्वास या राहत से जुड़ा बड़ा निर्णय दे सकती है।
10 दिसंबर क्यों महत्वपूर्ण?
10 दिसंबर की सुनवाई में यह स्पष्ट होने की संभावना है कि—
- क्या रेलवे वास्तव में विवादित भूमि पर कार्रवाई कर सकता है?
- क्या प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास योजना बनेगी?
- क्या दोनों पक्षों के दावों की संयुक्त जांच होगी?
इसलिए पूरे उत्तराखंड की नजरें अब 9 दिसंबर पर टिकी हैं।
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