खबर संसार हल्द्वानी.एक सच्चे पत्रकार का धर्म और कर्म सत्ता से सवाल करना, समाज की आवाज उठाना, सच को सामने लाना ऐसा करने में उसे अपनो के बीच ताने तो सरकार से लेकर…. तमाम दिक्कते सामना करनी पडती, लेकिन वो जूनून के रूप में करता रहता है अंजाम जो हो उसकी कतई परवाह नहीं करता.पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती है, पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले लोग पत्रकारिता की पढ़ाई करते थे, बड़े संस्थानों से प्रशिक्षण लेते थे और वर्षों की मेहनत के बाद इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते थे।
एक सच्चे पत्रकार का धर्म और कर्म सत्ता से सवाल करना, समाज की आवाज उठाना, सच को सामने लाना
पत्रकारिता को एक जिम्मेदारी और मिशन के रूप में देखा जाता था। आज स्थिति काफी बदलती दिखाई दे रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण अब कोई भी व्यक्ति फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर खुद को पत्रकार घोषित कर देता है। कई ऐसे लोग, जिनका पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं रहा, वे भी मीडिया की पहचान का इस्तेमाल करने लगे हैं। कहीं गाड़ी चलाने वाला खुद को पत्रकार बता रहा है, तो कहीं दुकानदार या शादी-ब्याह में वीडियो रिकॉर्डिंग करने वाला व्यक्ति मीडिया का टैग लगाकर घूम रहा है।
चिंता की बात यह है कि अब कुछ स्थानों पर ऐसे लोगों के संगठन भी बनाए जा रहे हैं, जिनका पत्रकारिता की मूल भावना और पेशेवर मानकों से कोई वास्ता नहीं है। सुनने और देखने में आ रहा कि उत्तराखंड के देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल हल्द्वानी में कुछ यूट्यूबर और राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों को जोड़कर संगठन की कार्यकारिणी तैयार की गई है। सवाल यह उठता है कि क्या अनुभवी और वास्तविक पत्रकारों की कमी हो गई थी, जो सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वालों को पत्रकारिता का प्रतिनिधि बना दिया गया? इससे भी अधिक हैरानी तब होती है जब कुछ संगठनों के अध्यक्ष तक पेशेवर पत्रकार नहीं हैं। निश्चित रूप से डिजिटल मीडिया और यूट्यूब भी अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम हैं, लेकिन हर कंटेंट क्रिएटर को पत्रकार मान लेना पत्रकारिता की गंभीरता को कमजोर करता है। पत्रकारिता केवल कैमरा और माइक्रोफोन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे तथ्य जुटाने की क्षमता, निष्पक्षता, सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिकता का बड़ा महत्व होता है। यदि यही स्थिति लगातार बढ़ती रही, तो भविष्य में वास्तविक पत्रकारिता और केवल सोशल मीडिया प्रसिद्धि के बीच का अंतर खत्म हो जाएगा। यह लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि जब चौथा स्तंभ कमजोर होता है, तो समाज में भ्रम, पक्षपात और गलत सूचनाओं का खतरा बढ़ जाता है


