देशभर में इन दिनों एथेनॉल फ्यूल चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। सरकार द्वारा इसे सभी पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के बाद लोगों के बीच इसके फायदे और नुकसान को लेकर बहस तेज हो गई है। कई वाहन मालिकों का मानना है कि एथेनॉल के इस्तेमाल से गाड़ियों के इंजन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, जिससे इसे लेकर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं।
एथेनॉल का इतिहास क्या कहता है?
बहुत कम लोग जानते हैं कि शुरुआती दौर में जब ऑटोमोबाइल उद्योग विकसित हो रहा था, तब वाहनों के लिए एथेनॉल सबसे पसंदीदा ईंधन माना जाता था। हालांकि, 19वीं सदी के अंतिम वर्षों और 20वीं सदी की शुरुआत में कच्चे तेल की खोज ने पूरी तस्वीर बदल दी।
पेट्रोल का उत्पादन और रिफाइनिंग एथेनॉल की तुलना में अधिक सस्ता साबित होने लगा। इसके साथ ही तेल कंपनियों ने बड़े स्तर पर लॉबिंग की और अमेरिका जैसे देशों में एथेनॉल पर भारी टैक्स लगा दिए गए। सस्ते पेट्रोल और मजबूत कारोबारी मॉडल के कारण एथेनॉल धीरे-धीरे पीछे छूट गया और दुनिया की निर्भरता पेट्रोल और डीजल पर बढ़ती चली गई।
एथेनॉल की वापसी के पीछे क्या वजह है?
आज प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर चुनौतियों के बीच कई सरकारें फिर से एथेनॉल को बढ़ावा दे रही हैं। पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में इसे दोबारा अपनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इसकी वापसी के साथ कई तरह की आशंकाएं भी सामने आ रही हैं।
इंजन को लेकर क्यों जताई जा रही है चिंता?
एथेनॉल को लेकर सबसे बड़ी चिंता वाहनों के इंजन की सुरक्षा को लेकर है। बताया जा रहा है कि एथेनॉल में नमी को सोखने की क्षमता होती है, जिससे पुराने इंजनों में जंग लगने का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा यह पाइप और रबर से बने कुछ हिस्सों पर भी असर डाल सकता है, जिससे वाहन मालिकों की चिंता बढ़ी हुई है।
माइलेज को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
एथेनॉल विवाद की दूसरी बड़ी वजह माइलेज को माना जा रहा है। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (एनर्जी डेंसिटी) पेट्रोल की तुलना में कम होती है। ऐसे में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों का माइलेज लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसका सीधा असर ईंधन की खपत और आम लोगों के खर्च पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। यही कारण है कि भारत में एथेनॉल को लेकर व्यापक बहस और विरोध देखने को मिल रहा है।
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