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पूर्वजों का ऋण उतरता है Shradh करने से, ऐसे करें पिंड दान और तर्पण

अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक Shradh रहते हैं।

इन 16 दिनों के लिए हमारे पितृ सूक्ष्म रूप में हमारे घर में विराजमान होते हैं। श्राद्धकर्म से पितृगण के साथ देवता भी तृप्त होते हैं। Shradh-तर्पण हमारे पूर्वजों के प्रति हमारा सम्मान है। इसी से पितृ ऋण भी चुकता होता है।

शास्त्रों के अनुसार पितृगणों का श्राद्ध कर्म करने के लिए वर्ष में 96 अवसर मिलते हैं। साल के 12 माह में 12 अमावस्या तिथि को भी Shradh किया जा सकता है। श्राद्ध कर्म करने से तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को तर्पण किया जा सकता है।

पितृ पक्ष में सभी तिथियों का अलग-अलग महत्व

श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक होता है। Shradh पुत्र, पोता, भतीजा या भांजा करते हैं। जिनके घर में पुरुष सदस्य नहीं हैं, उनमें महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं। पितृ पक्ष में सभी तिथियों का अलग-अलग महत्व है।

जिस व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि पर होती है, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर Shradh कर्म किए जाते हैं। पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष आरंभ होता है। प्रतिपदा तिथि पर नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो और मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।

पंचमी तिथि पर अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु हुई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए। अगर किसी महिला की मृत्यु हो गई है और मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है तो उसका श्राद्ध नवमी तिथि पर किया जाता है।एकादशी पर मृत संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।

जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका Shradh चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए। सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पर ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए। जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।

ऐसे करें श्राद्ध

Shradh के 16 दिनों में अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करें। इन दिनों में घर में 16 या 21 मोर के पंख अवश्य लाकर रखें। शिवलिंग पर जल मिश्रित दुग्ध अर्पित करें। घर में प्रतिदिन खीर बनाएं। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालें। माना जाता है कि यह सभी जीव यम के काफी निकट हैं।

Shradh पक्ष में व्यसनों से दूर रहें। पवित्र रहकर ही श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य भी वर्जित माने गए हैं। श्राद्ध का समय दोपहर में उपयुक्त माना गया है। रात्रि में श्राद्ध नहीं किया जाता। श्राद्ध के भोजन में बेसन का प्रयोग वर्जित है। श्राद्ध कर्म में लोहे या स्टील के पात्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पितृदोष जब शांत हो जाता है तो स्वास्थ्य, परिवार और धन से जुड़ी बाधाएं भी दूर हो जाती हैं।

विधि

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार Shradh करने की भी विधि होती है। यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है। शास्त्रसम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए। श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है।

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