जर्मनी की जानी-मानी कार कंपनी फॉक्सवैगन ने 2030 तक करीब 1,00,000 नौकरियां खत्म करने की योजना बनाई है। कंपनी ने दूसरे चरण में 50,000 और पदों की कटौती को मंजूरी दी है। यह फैसला इलेक्ट्रिक कारों की मांग, बढ़ती लागत, अमेरिकी टैरिफ और चीनी कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच लिया गया है।
कंपनी के सामने कम नहीं चुनौतियां
फॉक्सवैगन के इस फैसले का असर दुनिया भर में उसके कुल कर्मचारियों में से लगभग 15% पर पड़ सकता है। कंपनी इलेक्ट्रिक कारों की कम मांग, ज्यादा लागत, अमेरिकी टैरिफ और चीनी कार निर्माताओं से बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
कंपनी मौजूदा बाजार परिस्थितियों के अनुसार कर्मचारियों की संख्या और प्रोडक्शन कैपेसिटी कम करना चाहती है। यह कदम उसके इतिहास के सबसे बड़े रीस्ट्रक्चरिंग प्रयासों में से एक माना जा रहा है।
कंपनी क्यों कर रही छंटनी?
यूरोप में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री उम्मीद के मुताबिक तेजी से नहीं बढ़ी है। वहीं, इस क्षेत्र में चीनी कंपनियां मजबूत प्रतिस्पर्धी बनकर उभरी हैं। इसके अलावा, जर्मनी में उत्पादन लागत अधिक है और अमेरिकी टैरिफ का भी दबाव है।
अमेरिका ने यूरोपीय संघ (EU) से आयात होने वाली कारों और ट्रकों पर पहले के 25% की जगह टैरिफ बढ़ाकर 30% कर दिया है। फॉक्सवैगन के सीईओ ओलिवर ब्लूम के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ नियमों से कंपनी के सालाना ऑपरेटिंग प्रॉफिट को लगभग 5.9 अरब डॉलर (करीब 5 अरब यूरो) का सीधा नुकसान हो रहा है।
फॉक्सवैगन की तुलना में उसके लग्जरी ब्रांड पोर्शे को टैरिफ से ज्यादा नुकसान हो रहा है। इन चुनौतियों के बीच कंपनी लागत कम करने और कामकाज को अधिक कुशल बनाने पर जोर दे रही है। नौकरियों में कटौती इसी बड़े रीस्ट्रक्चरिंग प्लान का हिस्सा है।
समझें पूरा मामला
- फॉक्सवैगन ने 2030 तक 50,000 और नौकरियां खत्म करने का फैसला किया है।
- पहले चरण में करीब 50,000 पदों को धीरे-धीरे खत्म करने पर सहमति बनी थी।
- कई कर्मचारियों के साथ VRS और अर्ली रिटायरमेंट के समझौते हो चुके हैं।
- सितंबर 2026 में सुपरवाइजरी बोर्ड ने 50,000 अतिरिक्त नौकरियों की कटौती मंजूर की।
- कुल मिलाकर लगभग 1,00,000 नौकरियों पर असर पड़ेगा।
- कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से नहीं हटाया जाएगा।
- यह कटौती कंपनी के ‘फ्यूचर प्लान 2030’ का हिस्सा है।
- इलेक्ट्रिक कारों की कम मांग और चीनी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा बड़ी चुनौतियां हैं।
- जर्मनी की ज्यादा उत्पादन लागत और अमेरिकी टैरिफ से भी कंपनी पर दबाव है।
- फॉक्सवैगन लागत घटाकर कामकाज को अधिक कुशल बनाना चाहती है।
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