उज्जैन। नववर्ष की शुरुआत के साथ भारत में जिस पर्व का सबसे अधिक इंतजार रहता है, वह है मकर संक्रांति। यह पर्व सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में अत्यंत शुभ माना गया है। मकर संक्रांति 2026 इस बार 14 जनवरी को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं और इसे देवताओं का दिन कहा गया है।
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, उत्तरायण काल में किए गए पुण्य कर्मों का फल कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति पर स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन की गई सूर्य उपासना से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
देशभर में अलग-अलग रूप
भारत की सांस्कृतिक विविधता इस पर्व में साफ दिखाई देती है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, दक्षिण भारत में पोंगल, असम में भोगाली बिहू और गुजरात में पतंग पर्व के रूप में मनाया जाता है। हर जगह इसका संदेश एक ही है—समृद्धि, ऊर्जा और नई शुरुआत।
मकर संक्रांति पर क्यों खास है खान-पान
इस दिन तिल और गुड़ से बने व्यंजन जैसे तिल के लड्डू, खिचड़ी, दही-चूड़ा का सेवन किया जाता है। तिल-गुड़ शरीर को ऊष्मा प्रदान करता है और सर्दी के मौसम में स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। साथ ही यह रिश्तों में मिठास का प्रतीक भी है।
स्नान-दान से खुलता है भाग्य
शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद तिल, गुड़, चावल, दाल, वस्त्र और कंबल का दान अत्यंत फलदायी माना गया है। इससे कुंडली में सूर्य और शनि की स्थिति मजबूत होती है।
पितृदोष से मुक्ति का योग
इस शुभ दिन श्रद्धा भाव से पितरों का स्मरण कर अन्न और तिल का दान करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
इसे भी पढ़े- पवन खेड़ा की कोर्ट में होगी पेशी, ट्रांजिट रिमांड पर असम ले जाएगी पुलिस





