खबर संसार देहरादून। पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद अब सरकार से लेकर अधिकारी भी मान रहे पहली बाली जगह ही सर्वोत्तम है. सुबह का भूला शाम को वापस आया, मुहावरा है न वो आईएसबीटी गौलापर पर सही बैठता है जी हा हल्द्वानी में अंतरराज्यीय बस अड्डे के निर्माण के लिए परिवहन विभाग एक बार फिर अपने पुराने फैसले की ओर लौटता नजर आ रहा है। आठ साल तक निरीक्षण, बैठकों और कागजी कार्रवाई के बाद अब विभाग को गौलापार की वही वन भूमि उपयुक्त लग रही है।दरअसल, हल्द्वानी में आईएसबीटी निर्माण की योजना करीब 2010 से आरम्भ होते हुए केबिनेट मंत्री इंदिरा हृदेश ने 2016 में इसकी नीव रखी थी अखवारों में बड़े बड़े विज्ञापन भी छापे गए, भुगतान भी सबको मिला लेकिन फिर सरकार बदलने के बाद इसका मामला खटाई में पड़ गया, कारण बताया गया वहां कांकाल मिला खुदाई में फिलहाल मामला आगे खिसकता चला गया ।
इससे पूर्व आपको बता दें कि तमाम प्रयासों के बाद तराई पूर्वी वन प्रभाग की गौला रेंज में इसके लिए आठ हेक्टेयर वन भूमि उपलब्ध कराई गई थी। वर्ष 2016 में योजना का खाका तैयार होने के साथ ही शिलान्यास भी किया गया और कुछ शुरुआती कार्य शुरू हुए। हालांकि, इसके बाद योजना की दिशा बदल गई।19 दिसंबर 2018 को शासन ने परिवहन आयुक्त को पत्र जारी कर गौलापार में आईएसबीटी स्थापना की पूर्व में चल रही कार्रवाई निरस्त करने के निर्देश दिए। साथ ही उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के पास तराई केंद्रीय वन प्रभाग की वन भूमि पर 10 हेक्टेयर क्षेत्र में आईएसबीटी और वर्कशॉप स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए नई वन भूमि का प्रस्ताव तैयार कर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने कोकहा गया।
पश्चात नई भूमि को लेकर विभागीय स्तर पर प्रक्रिया तो चलती रही लेकिन वन भूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार के परिवेश पोर्टल पर अपलोड करने की नौबत नहीं आई। इसी बीच परिवहन विभाग और रोडवेज की संयुक्त कमेटी ने प्रस्तावित नई भूमि का निरीक्षण कर उसकी उपयोगिता का आकलन किया।कमेटी के आकलन में सामने आया कि नई जगह पर आईएसबीटी बनाने के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों का कटान करना पड़ेगा। इसके अलावा भविष्य की जरूरतों के लिहाज से भी यह भूमि अधिक उपयुक्त नहीं मानी गई। यहां तक पहुंचने के लिए अन्य अवस्थापना सुविधाएं भी विकसित करनी होगी
आपको ये भी बता दें कि गौलापार की आठ हेक्टेयर वन भूमि प्राप्त करने के लिए परिवहन विभाग ने वन विभाग को कई तरह की शर्तें पूरी की थीं। क्षतिपूरक वनीकरण के लिए बागेश्वर में दोगुनी यानी 16 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराई गई थी। पौधरोपण और अगले सात से 10 वर्षों तक उसके रखरखाव के लिए 26,33,548 रुपये जमा किए गए थे। इसके अतिरिक्त प्रस्तावित भूमि के आसपास पौधरोपण और उसके रखरखाव के लिए करीब सात लाख रुपये की राशि भी दी गई। वहीं, आठ हेक्टेयर वन भूमि की नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) के रूप में 83 लाख रुपये से अधिक जमा किए गए थे। इसके बावजूद सितंबर 2020 में परिवहन विभाग ने यह आठ हेक्टेयर भूमि वन विभाग को वापस सौंप दी। वन विभाग ने भी भूमि पर दोबारा कब्जा प्राप्त कर लिया। हैरानी की बात यह है कि जमीन वापस करने के बाद परिवहन विभाग ने इसके एवज में जमा कराई गई धनराशि की वापसी के लिए भी कोई मांग नहीं की। फिलहाल इन सबके बीच विकास रुका हुआ है चलो देखते है क्या होता है इसी आस के साथ उम्मीद है अच्छा ही होगा







