विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में साइप्रस के विदेश मंत्री कॉन्स्टेटिनोस कोम्बोस के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान कहा, “भारत और साइप्रस भरोसेमंद दोस्त और विश्वसनीय पार्टनर हैं।” जयशंकर का यह बयान न केवल भारत-साइप्रस संबंधों की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक पकड़ का भी संकेत देता है।
जयशंकर ने कहा कि “ट्रस्ट और टाइम टेस्टेड जैसे शब्द आज के समय में आसानी से नहीं कहे जा सकते, लेकिन साइप्रस के लिए मैं यह पूरे विश्वास से कह सकता हूं।” इस बयान ने तुर्किये (तुर्की) के राष्ट्रपति एर्दोगान की नींद उड़ा दी है, क्योंकि साइप्रस और तुर्किये के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद चल रहा है।
तुर्किये पर अप्रत्यक्ष निशाना
साइप्रस के विदेश मंत्री कॉन्स्टेटिनोस कोम्बोस ने भारत यात्रा के दौरान बिना नाम लिए तुर्किये पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा, “हमारे आइलैंड पर एक आक्रामक ताकत मौजूद है।” यह बयान तुर्किये की नीतियों पर एक स्पष्ट टिप्पणी मानी जा रही है।
भारत और साइप्रस के बीच सहयोग केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। साइप्रस तुर्किये के पुराने विरोधियों में शामिल है, और भारत की उसके साथ गहरी होती साझेदारी यूरोप में नई समीकरणों को जन्म दे रही है।
भारत-साइप्रस की दोस्ती का लंबा इतिहास
भारत और साइप्रस के रिश्ते आज के नहीं, बल्कि 1962 से चले आ रहे हैं — यानी 63 साल पुराना विश्वास। जब साइप्रस स्वतंत्र हुआ, उसी साल भारत ने उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। तब से लेकर आज तक दोनों देश हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक-दूसरे के साथ खड़े रहे हैं — चाहे बात संयुक्त राष्ट्र (UN) की हो, आतंकवाद की हो या मानवाधिकारों की।
यूरोप में भारत की नई भूमिका
साइप्रस जल्द ही यूरोपीय संघ परिषद की अध्यक्षता संभालने जा रहा है। भारत ने इस पर शुभकामनाएं देते हुए भरोसा जताया कि साइप्रस के नेतृत्व में भारत-यूरोप सहयोग नई ऊंचाइयों को छुएगा। यह साझेदारी भारत को न केवल एशिया, बल्कि यूरोप के केंद्र तक पहुंचाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
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