भारत में 10 मिनट में डिलीवरी का दावा करने वाला क्विक कॉमर्स मॉडल बीते कुछ वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हुआ, लेकिन अब यही मॉडल अपने सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है। नए साल की पूर्व संध्या पर देशभर में गिग वर्कर्स की राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने इस पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया।
दो लाख राइडर्स की हड़ताल ने क्यों बढ़ाई चिंता?
करीब दो लाख से अधिक डिलीवरी राइडर्स बेहतर भुगतान, सुरक्षा और सम्मान की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए। यूनियन नेताओं का कहना है कि असली समस्या 10 मिनट की डिलीवरी समय-सीमा है, जो राइडर्स को तेज और जोखिम भरी ड्राइविंग के लिए मजबूर करती है।
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कोरोना से शुरू हुआ, लेकिन अब सवालों में मॉडल
कोरोना महामारी के दौरान जरूरी सामान की तेज डिलीवरी की जरूरत ने इस मॉडल को जन्म दिया। उस समय 30 मिनट में डिलीवरी भी बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। अमेरिका में जहां Getir और Gopuff जैसे प्लेटफॉर्म संकट में आ गए, वहीं भारत में यह मॉडल और आक्रामक होता चला गया।
डार्क स्टोर्स पर भारी निवेश
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, Blinkit, Swiggy Instamart और Zepto ने शहरों के भीतर डार्क स्टोर्स पर अरबों रुपये निवेश किए। Savills Plc का अनुमान है कि 2030 तक डार्क स्टोर्स की संख्या 7,500 तक पहुंच सकती है।
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राइडर्स क्यों बता रहे हैं काम को खतरनाक?
गिग वर्कर्स का कहना है कि:
- देरी पर खराब रेटिंग
- सुपरवाइजर का दबाव
- आर्थिक पेनाल्टी
उन्हें तेज बाइक चलाने पर मजबूर करती है। दिल्ली जैसे शहरों में ट्रैफिक और प्रदूषण खतरे को और बढ़ा देते हैं।
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निवेशक भी हुए सतर्क
नए लेबर कोड और सामाजिक सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता के बीच Swiggy और Eternal (Zomato-Blinkit) के शेयरों में अक्टूबर से अब तक करीब 20% की गिरावट दर्ज की गई है।
कंपनियों का क्या कहना है?
Eternal के CEO दीपेंद्र गोयल का दावा है कि 10 मिनट डिलीवरी तेज रफ्तार नहीं, बल्कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का नतीजा है। उनका कहना है कि राइडर्स की औसत स्पीड सिर्फ 16 किमी/घंटा रहती है।
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आगे क्या?
- भारत में लेबर की कोई कमी नहीं, लेकिन सवाल यही है —
- क्या गिग वर्कर्स सुरक्षित हैं, संतुष्ट हैं और उन्हें जोखिम के हिसाब से मेहनताना मिल रहा है?
- इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि 10 मिनट डिलीवरी मॉडल का भविष्य क्या होगा।
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