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नेतन्याहू की ईरान नीति से बढ़ी मुश्किलें, अमेरिका और अरब देशों ने बनाई दूरी

ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में करने की कोशिश अब इजराइल के लिए नई मुश्किलें पैदा करती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति को लेकर न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ संबंधों में भी तनाव के संकेत मिल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात इजराइल को एक गंभीर कूटनीतिक चुनौती की ओर ले जा रहे हैं।

ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ी तल्खी

हालिया घटनाक्रमों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई बातचीत में मतभेद खुलकर सामने आए। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ट्रंप ने नेतन्याहू को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि उनकी नीतियां क्षेत्र में शांति स्थापित करने की कोशिशों को प्रभावित कर रही हैं।

बताया जा रहा है कि अमेरिका ईरान के साथ संभावित शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है और वह किसी भी ऐसी कार्रवाई के पक्ष में नहीं है जो इस प्रक्रिया को बाधित करे। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्विक कूटनीतिक फैसलों में अंतिम भूमिका अमेरिका की होगी।

खाड़ी देशों से भी बढ़ी दूरी

इजराइल की ईरान नीति का असर उसके खाड़ी देशों के साथ संबंधों पर भी दिखाई दे रहा है। वर्ष 2020 में हुए अब्राहम अकॉर्ड के बाद संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इजराइल के साथ संबंधों को नई दिशा दी थी, लेकिन मौजूदा तनाव ने इन रिश्तों पर दबाव बढ़ा दिया है।

हाल ही में इजराइल की ओर से यह दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने यूएई का गोपनीय दौरा कर वहां के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की। हालांकि यूएई के विदेश मंत्रालय ने इस दावे को तुरंत खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वह किसी भी गुप्त सैन्य या सुरक्षा समझौते का हिस्सा नहीं है।

विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की संभावित प्रतिक्रिया और मुस्लिम देशों में अपनी छवि को लेकर चिंतित खाड़ी देश अब इजराइल से दूरी बनाए रखने की नीति अपना रहे हैं।

बहरीन ने भी जताई असहजता

गाजा और लेबनान में जारी सैन्य अभियानों को लेकर बहरीन ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है। वर्ष 2023 में गाजा में सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद बहरीन ने अपना राजनयिक प्रतिनिधि इजराइल से वापस बुला लिया था। यह कदम दोनों देशों के संबंधों में आई असहजता का संकेत माना गया।

नेतन्याहू की रणनीति क्यों पड़ रही भारी?

बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक पहचान लंबे समय से इजराइल की सुरक्षा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ कठोर रुख पर आधारित रही है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यही रणनीति उनके लिए चुनौती बनती नजर आ रही है।

जहां अमेरिका क्षेत्रीय स्थिरता और तेल कीमतों में संतुलन बनाए रखने के लिए संघर्ष को समाप्त करने का पक्षधर माना जा रहा है, वहीं नेतन्याहू घरेलू राजनीतिक दबावों और अपने खिलाफ चल रहे मामलों के बीच कठोर रुख बनाए हुए हैं।

गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े मोर्चों पर लगातार तनाव ने इजराइल की सैन्य क्षमता और अर्थव्यवस्था पर भी असर डाला है। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबा खिंचता संघर्ष देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।

कूटनीति बनाम सैन्य शक्ति की बहस

हाल के घटनाक्रमों के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आधुनिक दौर में केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि प्रभावी कूटनीति से भी संघर्षों का समाधान निकाला जाता है। अमेरिका के दबाव और अरब देशों की बदलती प्राथमिकताओं ने इजराइल को यह संकेत दिया है कि क्षेत्रीय राजनीति में सहयोग और संवाद की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है।


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