कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को Akshaya Navami मनाया जाता है। इस साल 2 नवंबर को अक्षय नवमी मनाई जा रही है। हिन्दू धर्म में अक्षय नवमी का खास महत्व है। अक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड़ की पूजा कर उसके नीचे भोजन करने का खास महत्व होता है। पंडितों का मानना है कि महिलाएं आंवला के पेड़ की पूजा करती है और उसके नीचे बैठकर संतान की प्राप्ति तथा उसकी रक्षा हेतु प्रार्थना करती हैं। साथ ही अक्षय नवमी के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का खास महत्व होता है।
Akshaya Navami का महत्व
पुराणों में वर्णन किया गया है कि Akshaya Navami के दिन ही विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक नामक दैत्य को मारा था। साथ ही अक्षय नवमी के दिन ही श्रीकृष्ण ने कंस का वध करने से पहले तीन वनों की परिक्रमा की थी। आंवला नवमी के दिन लोग मथुरा-वृंदावन की परिक्रमा करते हैं तथा रात में जगराता भी कराते हैं। शास्त्रों की मान्यता है कि अक्षय नवमी से द्वापर युग का आरम्भ हुआ था। इसी दिन कृष्ण ने कंस का वध भी किया था और धर्म की स्थापना की थी। आंवले को अमरता का फल भी कहा जाता है।
अक्षय नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा
प्राचीन काल में काशी नाम के नगर में एक वैश्य दम्पत्ति रहता था जो निःसंतान था। उसके धन-सम्पत्ति खूब थी लेकिन संतान नहीं होने के कारण दम्पत्ति बहुत दुखी रहते थे। एक दिन वैश्य की पत्नी को उसकी एक पड़ोसन ने कहा अगर किसी बच्चे की बलि दे तो उसको संतान प्राप्त होगी। इस पर उसके एक कन्या वह कुएं धकेल दिया। इसके बाद कन्या की मृत्यु हो गयी और वह उसकी आत्मी दम्पत्ति को सताने लगीं। वैश्य की पत्नी को कोढ़ भी हो गया।
वैश्य को जब पता चला तो वह बहुत खुश हुआ और उसने अपनी पत्नी को कहा कि तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है। तुम गंगा किनारे जाकर अपने पापों का पश्चाताप करो। वैश्य की पत्नी ने ऐसा ही किया। तब मां गंगा ने प्रसन्न होकर उससे कहा कि अक्षय नवमी पर आंवले की पूजा कर आंवला खाओ तब तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। इस तरह आंवले की पूजा तथा अक्षय नवमी के व्रत से वैश्य दम्पत्ति के सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें संतान की भी प्राप्ति हुई।
आंवले के पेड़ से जुड़ी रोचक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी भ्रमण करने के लिए पृथ्वी लोक पर आईं। रास्ते में उन्हें भगवान विष्णु और शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। माता लक्ष्मी ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय होती है और बेलपत्र भगवान शिव को। मां लक्ष्मी को ख्याल आया कि तुलसी और बेल का गुण एक साथ आंवले के पेड़ में ही पाया जाता है।
ऐसे में आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिन्ह मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले की वृक्ष की पूजा की। कहा जाता है कि पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया, जिस दिन मां लक्ष्मी ने शिव और विष्णु की पूजा की थी, उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी। तभी से कार्तिक शुक्ल की नवमी तिथि को आंवला नवमी या अक्षय नवमी के रूप में मनाया जाने लगा।
इसे भी पढ़े-मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रानीबाग स्थित एचएमटी फैक्ट्री का निरीक्षण किया
हमारे फेसबुक पेज से जुड़ने के लिए क्लिक करें






