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पुत्रदा एकादशी आज, यह व्रत करने से होती है संतान सुख की प्राप्ति

पौष मास की शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस साल पुत्रदा एकादशी 2 जनवरी को पड़ रही है। ऐसा माना जाता है कि पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से संतान का सुख प्राप्त होती है। इस व्रत को करने वाले भक्त न केवल स्वस्थ तथा दीर्घायु संतान प्राप्त होती है बल्कि सभी प्रकार के दुख भी दूर हो जाते हैं।

कैसे करें पूजा

पौष मास में आने वाली पुत्रदा एकादशी का खास महत्व है। इसलिए इस दिन विशेष प्रकार से पूजा की जाती है। इसके लिए दशमी के दिन खाना खाने के बाद दातुन से मुंह धोएं जिससे भोजन का अंश मुंह में न रहे। इसके बाद सुबह उठकर पवित्र मन से व्रत करने का संकल्प करें। प्रातः जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।

उसके बाद धूप और दीप से कृष्ण जी की पूजा करें और दीपदान भी करें। यही नहीं एकादशी के दिन व्रत रखकर रात्रि जागरण करें और कीर्तन करें। भगवान से अपने किए गए पापों के लिए क्षमा मांगें। इसके बाद द्वादशी के दिन सभी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दें उसी बाद ही खाना खाएं।

पुत्रदा एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा

प्राचीन काल में भद्रावती नाम का एक नगर था जिसमें सुकेतु राजा राज्य करते थे। राजा सुकेतु के पास सबकुछ था लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी इससे वह दुखी रहते थे। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। एक दिन राजा और रानी निःसंतान होने के कारण दुखी हुए और अपने मंत्री को अपना राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गए। तपस्या के दौरान वह इतने दुखे हुए कि उन्होंने आत्महत्या करने की सोची लेकिन तभी उन्हें अपने विचार पर दुख हुआ और उन्होंने यह विचार त्याग दिया।

इसी समय उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी और वह उसी के अनुसार चलते रहे। इस प्रकार चलते हुए वह साधुओं की एक मंडली में पहुंच गए जहां उन्हें पुत्रदा एकादशी के महत्व का पता चला। इसके बाद दोनों पति-पत्नी ने पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत करना प्रारम्भ किया जिसके प्रभाव से उन्हें संतान पैदा हुई। इसके बाद पुत्रदा एकादशी का महत्व और भी बढ़ गया।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम

शास्त्रों के अनुसार पुत्रदा एकादशी पर निर्जला या फलाहारी उपवास रखने से बहुत लाभ मिलता है। जिन लोगों को स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं हैं, वह निर्जला उपवास न रखें। वह इस दिन फलाहारी व्रत का पालन करें। एकादशी व्रत रखने से पहले दशमी तिथि से ही व्रत संबंधित नियमों का पालन करें। इसलिए दशमी तिथि को भी सात्विक भोजन ही ग्रहण करें। इस दिन जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का स्मरण करें।  इस दिन अपना पूरा ध्यान भजन-कीर्तन और श्रीहरि की आराधना में लगाएं। व्रत के दिन ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन करें और और किसी के लिए भी मन में नकारात्मक भाव ना रखें।

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