खबर संसार हल्द्वानी ज्योतिषाचार्य मंजू जोशी।यदि राहु व केतु जैसे क्रूर ग्रहों का हो दुष्प्रभाव ये चढ़ाए मिलेगा निश्चित लाभ जी हा यदि राहु व केतु जैसे क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव हो रहा हो, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो रही हो, राहु की महादशा के कारण मानसिक तनाव हो रहा हो ऐसे जातकों को भैरवाष्टमी पर भैरव मंदिर जाकर सरसों के तेल से दीपक जलाना चाहिए व काले तिल अर्पित करें, उड़द की दाल से बने हुए पकवान बटुक भैरव को अर्पित करने चाहिए। जी हा ये खास दिन 27 नवंबर 2021 शनिवार को भैरवाष्टमी मनाई जाएगी।
यदि राहु व केतु जैसे क्रूर ग्रहों का हो दुष्प्रभाव ये चढ़ाए मिलेगा निश्चित लाभ
बताते चले की भगवान शिव के उग्र स्वरूप को काल भैरव के नाम से जाना जाता है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मार्गशीर्ष माह की अष्टमी तिथि को भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है धार्मिक मान्यता अनुसार भगवान शिव के पांचवें स्वरूप के रूप में काल भैरव की उत्पत्ति हुई।धार्मिक मान्यतानुसार काल भैरव की पूर्ण श्रद्धा व विधिवत रूप से पूजन करने से शत्रु बाधा दूर होती है, भय से मुक्ति मिलती है, जिन जातकों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव अधिक होता है उससे मुक्ति प्रदान करते हैं काल भैरव। जिससे कि ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त बिल्वपत्र पर सफेद या लाल चंदन से ओम नमः शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाना भी अति श्रेष्ठ माना गया है। भैरव के वाहन कुत्ते को काल भैरव जयंती पर भोजन कराएं। काले कुत्ते को मीठी रोटी और गुड़ के पुए खिलाने से आपके जीवन से कष्टों का निवारण होता है।
धार्मिक मान्यतानुसार काल भैरव की उत्पत्ति के परिपेक्ष में यह कथा प्रचलित है। राजा दक्ष की पुत्री सती ने अपने पिता के इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह कर लिया। इससे राजा दक्ष काफी क्रोधित हो गए। उन्होंने भगवान शिव के अपमान करने हेतु एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें पुत्री सती और जमाता भगवान शिव को आमंत्रित नहीं करने का निर्णय लिया।
जब देवी सती के संज्ञान में यह बात आई तो देवी सती ने पित्र मोह में भगवान शिव से उस यज्ञ में चलने का आग्रह किया, परंतु भगवान शिव ने उनको काफी समझाया कि बिना आमंत्रण वहां जाना उचित नहीं होगा। परंतु देवी सती बिना आमंत्रण के ही राजा दक्ष के यज्ञ में पहुंच गई जहां पर राजा दक्ष ने भगवान भोलेनाथ का अपमान किया अपने स्वामी के अपमान से आहत होकर देवी सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। त्रिकालदर्शी भगवान शिव यह देखकर अत्यंत क्रोधित व विचलित हो गए। और उन्होंने अपने उग्र स्वरूप काल भैरव के रूप की रचना की, जिन्होंने यज्ञ स्थल पर जाकर राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।



