उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र की सबसे काली रात बताया। उन्होंने कहा कि यह वह समय था जब व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते संविधान को कुचला गया। कैबिनेट को दरकिनार कर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने आपातकाल की घोषणा कर दी, और राष्ट्रपति ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए।
एक लाख से अधिक गिरफ्तार, मौलिक अधिकार छीने गए
धनखड़ ने बताया कि आपातकाल के दौरान 1.4 लाख लोगों को जेल में डाला गया। मौलिक अधिकार खत्म कर दिए गए और न्यायपालिका तक आम नागरिकों की पहुंच रोक दी गई। नौ उच्च न्यायालयों ने अपने फैसले में मौलिक अधिकारों की रक्षा की बात की, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पलट दिया। उन्होंने कहा, “यह संविधान और जनता के विश्वास पर गहरा आघात था।”
संविधान हत्या दिवस की आवश्यकता क्यों?
उपराष्ट्रपति ने युवाओं से कहा कि वे उस दौर को समझें और सीखें कि लोकतंत्र की रक्षा क्यों जरूरी है। उन्होंने कहा कि ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाना इसलिए जरूरी है ताकि हम यह न भूलें कि कौन दोषी थे और उन्होंने क्यों ऐसा किया। उन्होंने जस्टिस एच.आर. खन्ना का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने असहमति जताकर लोकतंत्र की असली भावना को जीवित रखा।
शिक्षा, नवाचार और पूर्व छात्रों की भूमिका पर जोर
अपने संबोधन में धनखड़ ने विश्वविद्यालयों को सिर्फ डिग्री देने वाला केंद्र नहीं, बल्कि सोच और नवाचार का केन्द्र बताया। उन्होंने कहा कि पूर्व छात्र किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यदि 1 लाख पूर्व छात्र ₹10,000 वार्षिक योगदान करें, तो 100 करोड़ की राशि से संस्थान आत्मनिर्भर बन सकता है।
राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से नि) ने भी समारोह में युवाओं की भूमिका और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक सिर्फ पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, वे राष्ट्र का नेतृत्व गढ़ते हैं। समारोह में उपराष्ट्रपति ने अपने माता-पिता के नाम पर दो पौधे भी रोपे। इस अवसर पर उत्तराखंड के वरिष्ठ प्रशासनिक और राजनीतिक अधिकारी, मंत्रीगण और कुलपति भी उपस्थित रहे।
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