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काल भैरव पूजा से दांपत्य जीवन में आतीं है खुशियां व दूर होती हैं बीमारियां

Kaal Bhairav को भगवान शिव का तीसरा रूद्र अवतार माना जाता है। पुराणों के मुताबिक मार्गशीष महीने के कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन ही भगवान काल भैरव प्रकट हुए थे। इस बार काल भैरव अष्टमी 16 नवंबर को है। इस कृष्णाष्टमी को मध्याह्न काल यानी दोपहर में भगवान शंकर से भैरव रूप की उत्पत्ति हुई थी। भगवान भैरव से काल भी डरता है।

इसलिए उन्हें कालभैरव भी कहते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक कालभैरव श्रीकृष्ण के दाहिनी आंख से प्रकट हुए थे, जो आठ भैरवों में से एक थे। Kaal Bhairav रोग, डर, संकट और दुख दूर करने वाले देवता हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर हो जाती हैं। सभी पौराणिक देवी मंदिरों के साथ ही काल भैरव के मंदिर भी हैं। इस दिन काल भैरव का सिंदूर और चमेली के तेल से श्रृंगार करना चाहिए। हार-फूल चढ़ाएं, धूप-दीप जलाएं। भैरव महाराज को इमरती का भोग लगाएं।

शिवपुराण के अनुसार इस दिन भगवान शंकर के अंश से काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अपने अंहाकर में चूर अंधकासुर दैत्य ने भगवान शिव के ऊपर हमला कर दिया था। उसके संहार के लिए भगवान शिव के खून से भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव शिव का ही स्वरूप हैं। इनकी आराधना करने से समस्त दुखों व परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है।

पुराणों में बताए हैं 8 भैरव

स्कंद पुराण के अवंति खंड में लिखा है कि भगवान भैरव के 8 रूप हैं। इनमें से काल भैरव तीसरा है। शिव पुराण के अनुसार माना जाता है कि जब दिन और रात का मिलन होता है। यानी शाम को प्रदोष काल में शिव के रौद्र रूप से भैरव प्रकट हुए थे। भैरव से ही बाकी 7 और प्रकट हुए जिन्हें अपने रूप और काम के हिसाब से नाम दिए हैं। उनके नाम, रुरु भैरव, संहार भैरव, काल भैरव, असित भैरव, क्रोध भैरव, भीषण भैरव, महा भैरव और खटवांग भैरव।

भैरव के तीन स्वरूप

बटुक भैरव- बटुक भैरव को भैरव महाराज का सात्विक और बाल स्वरूप माना जाता है। इनकी पूजा से भक्त को सभी तरह के सुख, लंबी आयु, अच्छी सेहत, मान-सम्मान और ऊंचा पद मिल सकता है।

काल भैरव- ये स्वरूप भैरव का तामस गुण को समर्पित है। ये स्वरूप भक्तों के लिए कल्याणकारी है, इनकी कृपा से भक्त का अनजाना भय दूर होता है। काल भैरव को काल का नियंत्रक माना गया है। इनकी पूजा से भक्त के सभी दुख दूर होते हैं, शत्रुओं का प्रभाव खत्म होता है।

आनंद भैरव- ये भैरव का राजस स्वरूप है। देवी मां की दस महाविद्याएं हैं और हर एक महाविद्या के साथ भैरव की भी पूजा होती है। इनकी पूजा से धन, धर्म की सिद्धियां मिलती हैं।

दूर होती हैं तकलीफ

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि भैरव का अर्थ है भय को हरने या जीतने वाला। इसलिए काल भैरव रूप की पूजा से मृत्यु और हर तरह के संकट का डर दूर हो जाता है। नारद पुराण में बताया है कि काल भैरव की पूजा से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। बीमारियां और तकलीफ भी दूर होती हैं। काल भैरव की पूजा पूरे देश में अलग-अलग नाम से और अलग तरह से की जाती है। कालभैरव भगवान शिव की प्रमुख गणों में एक हैं।

पूजन विधि

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि अष्टमी तिथि को प्रातः स्नानादि करने के पश्चात व्रत का संकल्प लें। भगवान शिव के समक्ष दीपक जलाएं और पूजन करें। कालभैरव भगवान का पूजन रात्रि में करने का विधान है। शाम को किसी मंदिर में जाएं और भगवान भैरव की प्रतिमा के सामने चौमुखा दीपक जलाएं। अब फूल, इमरती, जलेबी, उड़द, पान नारियल आदि चीजें अर्पित करें।

इसके बाद वहीं आसन पर बैठकर Kaal Bhairav भगवान का चालीसा पढ़ना चाहिए। पूजन पूर्ण होने के बाद आरती करें और जानें-अनजाने हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगे। प्रदोष काल या मध्यरात्रि में जरूरतमंद को दोरंगा कंबल दान करें। इस दिन ऊं कालभैरवाय नम: मंत्र का 108 बार जाप करें। पूजा के बाद भगवान भैरव को जलेबी या इमरती का भोग लगाएं। इस दिन अलग से इमरती बनाकर कुत्तों को खिलाएं।

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