जब आप किसी टेलीकॉम कंपनी की सर्विस लेते हैं तो कंपनी के पास आपका नाम, मोबाइल नंबर और अकाउंट से जुड़ी कई जानकारियां मौजूद होती हैं। कंपनी अपने नियमों के अनुसार इस डेटा का इस्तेमाल सर्विस और मार्केटिंग के लिए करती है। कई बार कंपनियों के अलग-अलग डिपॉर्टमेंट्स के बीच भी कुछ जानकारी शेयर की जाती है। इसलिए मोबाइल कनेक्शन लेते समय प्राइवेसी पॉलिसी और डेटा-शेयरिंग ऑप्शन को ध्यान से पढ़ना जरूरी है।
ऑनलाइन फॉर्म और रजिस्ट्रेशन भी वजह बन सकते हैं
ऑनलाइन शॉपिंग, वेबसाइट रजिस्ट्रेशन, सर्वे और अलग-अलग सर्विसेज में मोबाइल नंबर देना जरूरी हो सकता है। ऐसे में हर जगह नंबर दर्ज करने से उसकी डिजिटल मौजूदगी बढ़ती जाती है। किसी वेबसाइट का डेटा लीक होने या कंपनी की डेटा-हैंडलिंग व्यवस्था मजबूत न होने पर नंबर अनजान लोगों तक पहुंच सकता है। इसके बाद स्पैम कॉल और फर्जी मैसेज आने शुरू हो सकते हैं।
ऐप्स की परमिशन से भी पहुंच सकता है नंबर
कई ऐप्स Contacts की परमिशन मांगते हैं। अगर आप यह परमिशन दे देते हैं तो ऐप आपकी कॉन्टैक्ट लिस्ट में मौजूद नंबरों को एक्सेस कर सकता है। इसलिए हर ऐप को कॉन्टैक्ट परमिशन देने से पहले यह जांचना चाहिए कि उसे इसकी वास्तव में जरूरत है या नहीं।
टेलीकॉम कंपनी का डेटा हैक होने का भी खतरा
बड़ी से बड़ी मोबाइल कंपनी भी साइबर हमले से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहती। कंपनी के सिस्टम में सेंध लगने पर हैकर्स यूजर्स की निजी जानकारी तक पहुंच सकते हैं। ऐसे डेटा ब्रीच में मोबाइल नंबर के साथ नाम, पता या अकाउंट से जुड़ी जरूरी जानकारी भी लीक होने का खतरा रहता है।
मोबाइल नंबर सुरक्षित रखने के 10 जरूरी तरीके
- मोबाइल ऑपरेटर के अकाउंट की Privacy सेटिंग जांचें।
- Data Sharing से जुड़ी सेटिंग्स जरूर देखें।
- अनावश्यक डेटा शेयरिंग विकल्प बंद करें।
- अनचाहे मार्केटिंग विकल्पों को बंद करें।
- फोन में इंस्टॉल ऐप्स की परमिशन समय-समय पर जांचें।
- गैर-जरूरी ऐप्स से Contacts की परमिशन हटा दें।
- हर वेबसाइट पर मोबाइल नंबर दर्ज करने से बचें।
- ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन में जरूरत के अनुसार अलग नंबर का इस्तेमाल करें।
- जरूरत पड़ने पर वर्चुअल नंबर का विकल्प इस्तेमाल करें।
- मोबाइल नंबर से जुड़ी प्राइवेसी को लेकर सावधानी बरतें।
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