लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशंस (अमेंडमेंट) बिल, 2026 पर चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री के आदेश पर बल प्रयोग और गोलीबारी की गई। इस बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आखिर भारत में भीड़ पर पुलिस को गोली चलाने का आदेश कौन देता है और इसके लिए कानून क्या कहता है।
भारतीय कानून में क्या हैं भीड़ नियंत्रण के नियम?
भीड़ को नियंत्रित करने और बल प्रयोग से जुड़े प्रावधान मुख्य रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में निर्धारित किए गए हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों के पुलिस मैनुअल भी इस प्रक्रिया को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कानून के अनुसार पुलिस किसी भी स्थिति में मनमाने ढंग से गोली नहीं चला सकती।
गैरकानूनी भीड़ को हटाने का अधिकार किसे है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 148 के अनुसार एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी या सब-इंस्पेक्टर से ऊपर के रैंक का अधिकारी गैरकानूनी भीड़ को तितर-बितर होने का आदेश दे सकता है। यदि भीड़ आदेश का पालन नहीं करती, तो धारा 149 के तहत कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को आवश्यक बल प्रयोग की अनुमति मिलती है।
आत्मरक्षा में कब चला सकती है पुलिस गोली?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 38 आत्मरक्षा के अधिकार की शुरुआत करती है। वहीं धारा 41 के तहत पुलिसकर्मी या कोई भी नागरिक तब जानलेवा बल या गोली का इस्तेमाल कर सकता है, जब उसके सामने मृत्यु या गंभीर चोट का सीधा और वास्तविक खतरा मौजूद हो।
पुलिस फायरिंग का आदेश कौन देता है?
पुलिस फायरिंग का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि घटनास्थल पर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट मौजूद हैं या नहीं। यदि किसी विरोध प्रदर्शन या दंगे के दौरान जिला मजिस्ट्रेट (DM), सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (ADM) जैसे एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट मौके पर मौजूद हों, तो पुलिस स्वयं गोली चलाने का फैसला नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट हालात का आकलन कर लिखित या आपातकालीन परिस्थिति में मौखिक आदेश जारी करते हैं।
यदि घटनास्थल पर कोई मजिस्ट्रेट मौजूद नहीं है और अचानक हिंसा भड़क जाती है, तो निर्णय लेने का अधिकार वहां मौजूद सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास होता है। इसमें स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO), सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP), डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) या उनके समकक्ष अधिकारी शामिल हो सकते हैं। हालांकि ऐसी स्थिति में भी गोली चलाना अंतिम विकल्प माना जाता है और उससे पहले अन्य सभी उपाय अपनाना आवश्यक होता है।
किन परिस्थितियों में अपवाद लागू होता है?
यदि पुलिसकर्मियों पर सीधा और जानलेवा हमला होता है, तो उन्हें आत्मरक्षा के अधिकार के तहत वरिष्ठ अधिकारी या मजिस्ट्रेट की अनुमति का इंतजार किए बिना तत्काल गोली चलाने की कानूनी छूट प्राप्त होती है।
पुलिस तुरंत फायरिंग क्यों नहीं कर सकती?
भारतीय पुलिस व्यवस्था बल के क्रमिक और न्यूनतम उपयोग के सिद्धांत का पालन करती है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और विभिन्न पुलिस मैनुअल में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी कार्रवाई में खतरे के अनुरूप न्यूनतम आवश्यक बल का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।
गोली चलाने से पहले किन चरणों का पालन किया जाता है?
- भीड़ को स्पष्ट रूप से तितर-बितर होने की मौखिक चेतावनी देना।
- आवश्यकता पड़ने पर भीड़ को गैरकानूनी जमावड़ा घोषित करना।
- वॉटर कैनन या आंसू गैस का इस्तेमाल करना।
- जरूरत पड़ने पर लाठीचार्ज करना।
- रबर बुलेट या प्लास्टिक राउंड जैसे गैर-घातक विकल्प अपनाना।
- हालात गंभीर होने पर चेतावनी के तौर पर हवा में गोली चलाना।
- जब सभी विकल्प विफल हो जाएं, तभी नियंत्रित तरीके से वास्तविक गोली चलाना।
वास्तविक गोली चलाने के दौरान किन नियमों का पालन होता है?
जब वास्तविक फायरिंग की अनुमति दी जाती है, तब भी पुलिस को निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। कार्रवाई का उद्देश्य किसी व्यक्ति की जान लेना नहीं, बल्कि हिंसक खतरे को समाप्त करना होता है। पुलिस मैनुअल में सामान्यतः कमर से नीचे निशाना लगाने का निर्देश दिया जाता है, ताकि व्यक्ति को निष्क्रिय किया जा सके और जान का जोखिम कम रहे।
इसके अलावा आदेश में यह भी निर्धारित किया जाता है कि कितनी गोलियां चलाई जाएंगी। जैसे ही भीड़ तितर-बितर हो जाए या खतरा समाप्त हो जाए, पुलिस को तत्काल फायरिंग रोकनी होती है।
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