भारतीय गांवों में रात के समय सुनाई देने वाली उल्लू की आवाज को पहले लोग अशुभ संकेत मानते थे, लेकिन अब खेती-किसानी में इसकी अहमियत तेजी से बढ़ रही है। किसान अब उल्लू को खेतों का प्राकृतिक रक्षक मानने लगे हैं। यह पक्षी रात के अंधेरे में खेतों की निगरानी करता है और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों का शिकार कर किसानों की मदद करता है।
चूहों और कीटों से फसलों की सुरक्षा
खेती में सबसे ज्यादा नुकसान चूहों, टिड्डियों और छोटे कीट-पतंगों से होता है। ये फसलों की जड़ों, अनाज और भंडारण को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। ऐसे में उल्लू किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।
उल्लू की आंखें इतनी तेज होती हैं कि वह घने अंधेरे में भी आसानी से शिकार देख सकता है। इसके अलावा इसकी सुनने की क्षमता भी काफी मजबूत होती है, जिससे यह सूखी पत्तियों के नीचे चलने वाले छोटे जीवों की हलचल तक पकड़ लेता है।
बिना आवाज के करता है शिकार
उल्लू के पंखों की बनावट खास होती है। जब यह उड़ता है तो लगभग कोई आवाज नहीं होती। यही वजह है कि चूहों और कीड़ों को संभलने का मौका नहीं मिल पाता। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक उल्लू सालभर में हजारों चूहों और हानिकारक कीटों का शिकार कर सकता है, जिससे खेतों को बड़ा फायदा मिलता है।
बिना खर्च के मिलती है फसल सुरक्षा
आज के समय में किसान फसलों को बचाने के लिए महंगे कीटनाशकों और पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
वहीं, उल्लू प्राकृतिक तरीके से फसलों की सुरक्षा करता है। इसकी मौजूदगी किसानों को बिना अतिरिक्त खर्च के एक ऐसा सुरक्षा गार्ड देती है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना खेतों की रक्षा करता है।
जैविक खेती में बढ़ रही उल्लू की अहमियत
देश में इको-फ्रेंडली और जैविक खेती का चलन तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में उल्लू जैसे पक्षियों की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। यह खेतों में चूहों, गिलहरियों और अन्य छोटे जीवों की संख्या को नियंत्रित रखता है।
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे खेतों के आसपास ऊंचे पेड़ या लकड़ी के स्टैंड लगाएं, ताकि उल्लू वहां बैठकर आसानी से शिकार कर सके और फसलों की सुरक्षा में मदद मिले।
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