भारत के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला सहित चार अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर Axiom-4 मिशन का सफल लॉन्च आज दोपहर 12:01 बजे (भारतीय समयानुसार) अमेरिका के नासा कैनेडी स्पेस सेंटर से हुआ। इस मिशन का मकसद चारों यात्रियों को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) तक पहुंचाना है। यह मिशन न केवल देश के लिए गर्व का विषय है, बल्कि भविष्य के गगनयान मिशन की तैयारी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। शुक्ला की यह यात्रा फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसX के फाल्कन 9 रॉकेट और ड्रैगन यान के जरिए शुरू हुई।
ISS कितनी ऊंचाई पर और क्यों मुश्किल है पहुंचना?
ISS धरती से करीब 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर लो-अर्थ ऑर्बिट में स्थित है और लगभग 28,000 किमी/घंटा की रफ्तार से पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इतनी तेज गति से घूमते स्टेशन से यान को जोड़ना किसी तकनीकी चमत्कार से कम नहीं। इसीलिए अंतरिक्ष यान को सटीक टाइमिंग और उच्चतम सुरक्षा मापदंडों के साथ वहां तक पहुंचाया जाता है।
ऑर्बिट एडजस्टमेंट: फेजिंग मैन्यूवर्स की भूमिका
जब रॉकेट पृथ्वी से उड़ान भरता है, तब वह तुरंत ISS से नहीं जुड़ सकता। अंतरिक्ष यान को धीरे-धीरे अपनी गति और ऊंचाई को समायोजित करना होता है ताकि वह ISS की कक्षा के साथ तालमेल बना सके। इस प्रक्रिया को Phasing Manoeuvres कहा जाता है, जिसमें कई छोटे-छोटे थ्रस्ट फायरिंग के जरिए यान अपने पथ को संशोधित करता है।
क्यों जरूरी है धीमी गति और 28 घंटे का इंतजार?
ISS से जुड़ना बेहद संवेदनशील काम है। स्पेस स्टेशन की गति और दिशा से पूरी तरह मेल खाना होता है, वरना एक छोटी सी गलती भी जानलेवा हो सकती है। यही कारण है कि ड्रैगन यान को धीरे-धीरे और सटीक रूप से ISS के पास लाया जाता है, ताकि टकराव का खतरा न हो और सुरक्षित डॉकिंग हो सके। इस मिशन में कुल 28 घंटे का समय इसीलिए लगता है।
कब होगा ड्रैगन का डॉकिंग?
मिशन प्लान के अनुसार, 26 जून को ड्रैगन यान ISS के हार्मनी मॉड्यूल के स्पेस-फेसिंग पोर्ट से जुड़ जाएगा। यह डॉकिंग पहले से तय लॉन्च विंडो और ईंधन की बचत को ध्यान में रखते हुए की जाती है।
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