रविवार को कुछ ही सेकेंड में नोएडा की चर्चित दो बहुमंजिला इमारतें धराशायी हो गईं। दोपहर के ठीक ढाई बजे इन ट्विन टॉवर को विस्फोटकों से उड़ा दिया गया। अब इन बहुमंजिला इमारतों को जगह मलबा ही बचा है। एपेक्स और सेयेन नामक इन टावर को सुपरटेक बिल्डर ने बनाया।
बाद में पाया गया कि इन्हें बनाने में नियमों का उल्लंघन किया गया। ये देश में गिराई जाने वाली सबसे बड़ी बहुमंजिला इमारतें हैं।एपेक्स (32 मंजिली) और सेयेन (30 मंजिला) जुड़वां टावर भारतीय राजधानी में सबसे ऊंचे कुतुब मीनार से ऊंचे थे।इस टावर को गिराने का फ़ैसला एक लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद लिया गया था। यह संघर्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय से शुरू हुआ था और इसका अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ।
इन टावर के निर्माण की कहानी 2004 में शुरू होती है। नोएडा (न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण) ने औद्योगिक शहर बनाने की योजना के तहत एक आवासीय क्षेत्र बनाने के लिए सुपरटेक नामक कंपनी को यह जगह आवंटित की । 2005 में, नोएडा बिल्डिंग कोड और दिशा निर्देश 1986 के अनुसार सुपरटेक ने प्रत्येक 10 मंजिल वाले 14 फ्लैटों की योजना तैयार की।
10 मंजिलों वाले 14 अपार्टमेंट भवनों के निर्माण की अनुमति दी गई
नोएडा अथॉरिटी ने 10 मंजिलों वाले 14 अपार्टमेंट भवनों के निर्माण की अनुमति दी गई, साथ ही यह भी प्रतिबंध लगाया गया था कि ऊंचाई 37 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। योजना के अनुसार, इस साइट पर 14 अपार्टमेंट और एक वाणिज्यिक परिसर के साथ एक गार्डन विकसित किया जाना था।2006 में कंपनी को निर्माण के लिए पुरानी शर्तों पर अतिरिक्त ज़मीन दी गई। सुपरटेक नई योजना बनाई। इसमें बिना गार्डन के दो और 10 मंजिल भवन बनाए जाने थे।अंत में, 2009 में, 40 मंजिलों के साथ दो अपार्टमेंट टावर बनाने के लिए अंतिम योजना तैयार की गई।
2011 में रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई।याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन टावरों के निर्माण के दौरान उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट मालिक अधिनियम, 2010 का उल्लंघन किया गया है।इसके मुताबिक केवल 16 मीटर की दूरी पर स्थित दो टावरों ने कानून का उल्लंघन किया था।याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इन दोनों टावरों को बगीचे के लिए आवंटित भूमि पर अवैध रूप से खड़ा किया गया था।
2012 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए मामला आने से पहले, नोएडा प्रशासन ने 2009 में दायर योजना (40 मंजिलों वाले दो अपार्टमेंट टावर) को मंजूरी दे दी ।मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अप्रैल 2014 में फ़ैसला आया। उसने इन टावरों को गिराने का आदेश भी जारी किया। यह भी आदेश दिया कि टावर बनाने वाले सुपरटेक को टावर गिराने का ख़र्च वहन करना चाहिए। यह भी आदेश किया कि पहले से ही खरीदने वालों को 14 फ़ीसदी ब्याज़ के साथ पैसा वापस करना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर रविवार को दोनों टावर गिर गए
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर रविवार को दोनों टावर गिर गए। पर इन टावर को बनाने की अनियमितता में शामिल रहे प्रशासनिक अमले और सुपरटेक के प्रबंधन पर कोई कार्रवाई नही हुई। टावर गिरने के दिन सिर्फ इस अनियमितता और घोटालों में शामिल होने वालों की लिस्ट ही जारी हो सकी। इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मानीटरिंग भी सर्वाच्च न्यायालय को करनी चाहिए। ये देखना चाहिए कि कार्रवाई जल्दी हो और कठोर हो। ऐसी हो कि आगे को ऐसा करने का हौंसला न कर सके। घोटाले में शामिल रहे अधिकारी और कर्मचारियों से नुकसान की राशि वसूली जानी चाहिए।
एक बात और आमतौर पर ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में कालोनाइजर नियम विरूद्ध निर्माण कराते हैं किंतु यह पहला मामला है, जिसमें यह कार्रवाई हुई है। पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अभी लंबी लड़ाई लड़नी होगी। हां इस आदेश का बड़ा फायदा ये होगा कि अब तक गलत भवन बनाने पर विकास प्राधिकरण के अधिकारी कालोनाइजन या भवन स्वामी से मिलकर शमन शुल्क लेकर मामला निपटा लेते ,अब ऐसा नही कर पांएगे। इन्हें भी गलत बने भवन गिरवाने होंगे। -अशोक मधुप
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