नई दिल्ली, 08 अक्टूबर 2025 भारत के सबसे प्रतिष्ठित व्यापारिक घरानों में से एक, टाटा समूह, इन दिनों आंतरिक मतभेदों के कारण सुर्खियों में है। समूह के शीर्ष स्तर पर चल रही खींचतान इतनी बढ़ गई है कि केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, दो केंद्रीय मंत्री जल्द ही टाटा समूह के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे ताकि तनाव कम किया जा सके और समूह में स्थिरता बनी रहे।
टाटा संस और ट्रस्ट्स में गहराता विवाद
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन, टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और डेरियस खंबाटा जैसे प्रमुख नाम इस बैठक में शामिल होंगे। टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखता है, हाल के महीनों में आंतरिक मतभेदों के कारण चर्चा में है। विवाद की जड़ बोर्ड नियुक्तियों, पारदर्शिता और टाटा संस की लंबित लिस्टिंग योजना से जुड़ी है।
दो खेमों में बंटा ट्रस्ट
ट्रस्टियों के बीच दो गुट बन गए हैं। एक गुट, जिसका नेतृत्व नोएल टाटा कर रहे हैं, मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने और सतर्कता के पक्ष में है। दूसरा गुट, जिसमें मेहली मिस्त्री, प्रमित झावेरी और डेरियस खंबाटा शामिल हैं, सुधारों की मांग कर रहा है। तनाव तब बढ़ा जब दूसरे गुट ने ट्रस्टी विजय सिंह की पुनर्नियुक्ति और नए निदेशकों की नियुक्ति का विरोध किया। इससे ट्रस्ट में शक्ति संतुलन तीन बनाम चार के अनुपात में बंट गया।
लिस्टिंग विवाद और शापूरजी पलोनजी की नाराजगी
विवाद का एक प्रमुख कारण टाटा संस की आरबीआई के नियमन के तहत “अपर लेयर एनबीएफसी” के रूप में लिस्टिंग है। कंपनी पर लिस्टिंग की समयसीमा पूरी करने का दबाव है, लेकिन उसने एनबीएफसी पंजीकरण रद्द करने के लिए आवेदन किया है ताकि सार्वजनिक लिस्टिंग से बचा जा सके। शापूरजी पलोनजी समूह, जिसके पास टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी है, इस कदम से नाराज है, क्योंकि वह लिक्विडिटी और मूल्यांकन के लिए लिस्टिंग को जरूरी मानता है।
सरकार की चिंता और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर सवाल
सरकार को डर है कि टाटा जैसे विश्वसनीय समूह में बढ़ता तनाव बाजार के भरोसे और भारतीय कॉरपोरेट गवर्नेंस मॉडल पर सवाल उठा सकता है। एन. चंद्रशेखरन, जिनका कार्यकाल हाल ही में पांच साल के लिए बढ़ाया गया है, निष्पक्ष रुख अपनाए हुए हैं। वह समूह की छवि को बनाए रखने के लिए सतर्कता से कदम उठा रहे हैं।
टाटा की विरासत दांव पर
यह विवाद केवल आंतरिक शक्ति संघर्ष नहीं है, बल्कि यह टाटा की उस नैतिक व्यावसायिक विरासत पर भी सवाल उठाता है, जिसने पिछले सौ सालों में इसे भारत का प्रतीक बनाया। जानकारों का मानना है कि आने वाले महीने टाटा समूह के भविष्य की दिशा तय करेंगे—परंपरा की राह या बदलाव का नया रास्ता।
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