पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव का प्रभाव अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के कारण प्राकृतिक गैस की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई प्रभावित हो रही है। इस स्थिति ने कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
ताजा जानकारी के मुताबिक फारस की खाड़ी के पास स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य पिछले करीब दो सप्ताह से संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। सुरक्षा हालात बिगड़ने के कारण इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले सैकड़ों मालवाहक जहाज प्रमुख बंदरगाहों के आसपास ही रुके हुए हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरती है दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। इसी रास्ते से कई देशों तक कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस की बड़ी मात्रा पहुंचती है। जहाजों की आवाजाही बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में दबाव बढ़ गया है और गैस की उपलब्धता को लेकर चिंता गहराने लगी है।
भारत की गैस जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर
भारत अपनी कुल प्राकृतिक गैस जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है। इसमें करीब 20 प्रतिशत गैस कतर से खरीदी जाती है। हाल ही में ईरान द्वारा कतर के गैस क्षेत्रों पर मिसाइल हमले किए जाने के बाद दुनिया की सबसे बड़ी गैस निर्यातक कंपनियों में से एक ने एहतियात के तौर पर उत्पादन अस्थायी रूप से रोक दिया। इसका असर एशियाई देशों को होने वाली गैस आपूर्ति पर पड़ा है।
गैस आपूर्ति को लेकर भारत सरकार के नए दिशा-निर्देश
संभावित संकट को देखते हुए भारत सरकार ने प्राकृतिक गैस की आपूर्ति और उपयोग को लेकर नई प्राथमिकता नीति लागू की है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए गैस वितरण की चरणबद्ध व्यवस्था तय की है, ताकि जरूरी सेवाओं और उत्पादन गतिविधियों पर कम से कम असर पड़े।
पहले चरण में घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता
सरकार के निर्देशों के अनुसार सबसे पहले घरेलू पाइप गैस, वाहनों के लिए सीएनजी, रसोई गैस उत्पादन और पाइपलाइन संचालन से जुड़े क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी। इन क्षेत्रों को पिछले छह महीनों की औसत खपत के आधार पर 100 प्रतिशत गैस आपूर्ति जारी रखने का फैसला लिया गया है।
उर्वरक उद्योग को मिलेगी 70% गैस
दूसरे चरण में उर्वरक कारखानों को प्राथमिकता दी गई है। सरकार के अनुसार इन संयंत्रों को उनकी पिछली छह महीनों की औसत खपत के आधार पर लगभग 70 प्रतिशत गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी, ताकि खाद उत्पादन पर बड़ा असर न पड़े।
उद्योग और चाय क्षेत्र को सीमित गैस सप्लाई
तीसरे चरण में चाय उद्योग, विनिर्माण क्षेत्र और अन्य औद्योगिक उपभोक्ताओं को राष्ट्रीय गैस ग्रिड के माध्यम से गैस उपलब्ध कराई जाएगी। इन क्षेत्रों के लिए औसत खपत का लगभग 80 प्रतिशत गैस आवंटन तय किया गया है।
वहीं चौथे चरण में शहरों में गैस वितरण करने वाली कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने नेटवर्क के जरिए औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को भी करीब 80 प्रतिशत गैस सप्लाई बनाए रखें।
विशेषज्ञों की राय: उद्योगों को करनी होगी सावधानी
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक संकट लंबा चलता है तो भारत को गैस खपत पर अस्थायी नियंत्रण करना पड़ सकता है।
ऊर्जा अर्थशास्त्र से जुड़े विशेषज्ञ किरीट पारेख के अनुसार भारत अपनी कुल गैस जरूरत का लगभग आधा हिस्सा विदेशों से आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के रूप में आता है।
उनका कहना है कि संकट की स्थिति में उद्योगों को गैस उपयोग में सावधानी बरतनी होगी, खासकर उन क्षेत्रों को जहां गैस उत्पादन प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
ऊर्जा और उद्योगों पर पड़ सकता है असर
पेट्रोलियम उद्योग में गैस का इस्तेमाल हाइड्रोजन उत्पादन के लिए भी किया जाता है। हालांकि हाइड्रोजन को बिजली के जरिए भी तैयार किया जा सकता है, लेकिन यह विकल्प काफी महंगा साबित होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल सरकार जरूरी क्षेत्रों में गैस आपूर्ति बनाए रखने के लिए वैकल्पिक उपायों पर काम कर रही है।
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